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अधिकमास में 33 मालपुए दान करने का धार्मिक महत्व

अधिकमास, जो 17 मई से 15 जून तक चलता है, एक पवित्र महीना है जिसमें 33 मालपुओं का दान विशेष महत्व रखता है। यह संख्या 33 कोटि देवताओं से जुड़ी है, और इस दान से भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है। जानें इस धार्मिक परंपरा के पीछे का रहस्य और अधिकमास में किए जाने वाले शुभ कार्यों के बारे में।
 

जानें इस संख्या का धार्मिक रहस्य


Adhik Maas, नई दिल्ली: अधिकमास एक अत्यंत पवित्र महीना है, जो 17 मई से शुरू होकर 15 जून तक चलता है। हिंदू पंचांग के अनुसार, यह हर तीन साल में आता है और इसे भगवान श्रीहरि विष्णु को समर्पित किया गया है। यह पंचांग सूर्य और चंद्रमा की गति पर आधारित है।


सौर वर्ष में 365 दिन होते हैं, जबकि चंद्र वर्ष में लगभग 354 दिन होते हैं। हर साल इन दोनों में 11 दिनों का अंतर होता है। जब यह अंतर तीन वर्षों में 33 दिनों का हो जाता है, तो इसे संतुलित करने के लिए अधिकमास का आयोजन किया जाता है।


शुभ कार्यों पर प्रतिबंध

इस महीने को मलमास और पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है। इस दौरान विवाह और अन्य शुभ कार्य वर्जित होते हैं। यह समय जप, तप, पूजा-पाठ और आध्यात्मिक साधना के लिए होता है। इस माह में की गई पूजा का फल सामान्य दिनों की तुलना में अधिक होता है। शास्त्रों के अनुसार, इस विशेष समय में 33 मालपुओं का दान अत्यंत शुभ माना जाता है।


पद्म पुराण में उल्लेख

पद्म पुराण के अनुसार, अधिकमास में 33 मालपुए दान करना विशेष रूप से शुभ है। ऐसा इसलिए है क्योंकि भगवान श्रीहरि विष्णु को मालपुए बहुत प्रिय हैं। इसीलिए, इस महीने में सबसे पहले भगवान को इस मिठाई का भोग अर्पित किया जाता है, और फिर इसे दान में दिया जाता है।


33 की संख्या का महत्व

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, 33 मालपुओं का संबंध 33 कोटि देवताओं से जोड़ा जाता है। माना जाता है कि इस दान से 33 कोटि देवता तृप्त होते हैं और आशीर्वाद प्रदान करते हैं। इसके साथ ही, पितरों की कृपा भी प्राप्त होती है, जिससे जीवन में सुख और समृद्धि आती है। भगवान विष्णु को 33 मालपुए अर्पित करने के बाद, इन्हें कांसे के पात्र में गरीबों और जरूरतमंदों को दान करना चाहिए। मालपुओं का दान करने से घर की दरिद्रता दूर होती है।