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बदरीनाथ धाम के निकट ग्लेशियर टूटने से बढ़ी जलवायु संकट की चिंता

उत्तराखंड के बदरीनाथ धाम के पास कंचनगंगा क्षेत्र में हाल ही में ग्लेशियर टूटने की घटना ने जलवायु संकट की गंभीरता को उजागर किया है। वैज्ञानिकों का मानना है कि बदलते मौसम के पैटर्न से ग्लेशियर कमजोर हो रहे हैं, जिससे प्राकृतिक आपदाओं का खतरा बढ़ रहा है। पर्यावरणविद् डॉ. अनिल जोशी ने चेतावनी दी है कि यह बदलाव न केवल पर्यावरण पर, बल्कि अर्थव्यवस्था और समाज पर भी नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है। जानें इस घटना के पीछे के कारण और इसके संभावित परिणाम।
 

ग्लेशियर टूटने की घटना

नई दिल्ली - उत्तराखंड के बदरीनाथ धाम के समीप कंचनगंगा क्षेत्र में हाल ही में ग्लेशियर के टूटने की घटना ने हिमालयी क्षेत्रों में जलवायु संकट की गंभीरता को एक बार फिर उजागर किया है। यह घटना बदरीनाथ धाम से लगभग चार किलोमीटर की दूरी पर हुई है। फिलहाल, जान-माल के नुकसान की कोई सूचना नहीं है, लेकिन वैज्ञानिक इसे संभावित खतरों का संकेत मानते हैं। प्रशासन स्थिति पर नजर रखे हुए है। चमोली के पुलिस अधीक्षक सुरजीत सिंह पंवार ने बताया कि क्षेत्र की निगरानी की जा रही है और आपात स्थिति के लिए टीमें तैयार हैं।


जलवायु परिवर्तन का प्रभाव

विशेषज्ञों का कहना है कि हिमालय में मौसम का पैटर्न तेजी से बदल रहा है। पहले जहां जनवरी और फरवरी में भारी बर्फबारी होती थी, वहीं अब मार्च और अप्रैल में अधिक बर्फ गिर रही है। वैज्ञानिकों के अनुसार, यह परिवर्तन ग्लेशियरों के लिए खतरा बन रहा है, क्योंकि गर्मियों में गिरने वाली बर्फ तेजी से पिघल जाती है, जिससे ग्लेशियर कमजोर हो रहे हैं।


पश्चिमी विक्षोभ का प्रभाव

वाडिया हिमालय भू-विज्ञान संस्थान के वैज्ञानिकों के अनुसंधान से पता चला है कि पश्चिमी विक्षोभ के बदलते स्वरूप ने हिमालयी मौसम के संतुलन को बिगाड़ दिया है। कमजोर पश्चिमी विक्षोभ के कारण सर्दियों में बर्फबारी कम हो रही है, जबकि गर्मियों में इसकी सक्रियता बढ़ने से बारिश और प्राकृतिक आपदाओं का खतरा बढ़ गया है। वैज्ञानिक डॉ. पंकज चौहान ने बताया कि पिंडारी और कफनी जैसे ग्लेशियर तेजी से प्रभावित हो रहे हैं।


आर्थिक और सामाजिक प्रभाव

पर्यावरणविद् डॉ. अनिल जोशी ने चेतावनी दी है कि मौसम में यह बदलाव केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका असर अर्थव्यवस्था और समाज पर भी पड़ेगा। खाद्य उत्पादन में कमी से अनाज की कीमतें बढ़ सकती हैं, और पर्यटन तथा बागवानी जैसे क्षेत्रों को भी नुकसान हो सकता है।


बर्फबारी के आंकड़े

इस वर्ष पिंडारी और कफनी ग्लेशियर क्षेत्र में अप्रैल में 158 सेंटीमीटर बर्फबारी दर्ज की गई, जबकि मार्च में 84 सेंटीमीटर बर्फ गिरी। वैज्ञानिकों का कहना है कि बढ़ते तापमान के कारण यह बर्फ तेजी से पिघल रही है। कई क्षेत्रों में तापमान सामान्य से 5 डिग्री सेल्सियस अधिक दर्ज किया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह स्थिति बनी रही, तो आने वाले वर्षों में हिमालयी जलधाराओं और जल संसाधनों पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।