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रुपए की गिरती कीमत पर आरएसएस की चिंता और सरकार की चुनौती

रुपए की कीमत में निरंतर गिरावट से देश की प्रतिष्ठा पर खतरा मंडरा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पुराने सिद्धांतों के अनुसार, यह केवल एक मुद्रा नहीं, बल्कि देश की गरिमा का प्रतीक है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने सरकार से आग्रह किया है कि रुपए की कीमत को गिरने नहीं दिया जाए। इस बीच, कुछ अर्थशास्त्रियों ने डॉलर बेचने के विकल्प को अस्वीकार किया है, जिससे सरकार के सामने एक चुनौती खड़ी हो गई है। क्या सरकार इस संकट का समाधान निकाल पाएगी? जानें पूरी कहानी में।
 

रुपए की कीमत में गिरावट

रुपए की वैल्यू लगातार घटती जा रही है, और यदि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पुराने विचारों के अनुसार देखा जाए, तो देश की प्रतिष्ठा भी इसी के साथ गिर रही है। मोदी और भाजपा के अन्य नेता हमेशा से मानते रहे हैं कि रुपया केवल कागज का एक टुकड़ा नहीं है, बल्कि यह देश की गरिमा का प्रतीक है। इस समय, एक डॉलर की कीमत 96 रुपए से अधिक हो गई है। जब मोदी ने 12 साल पहले प्रधानमंत्री पद संभाला था, तब यह कीमत लगभग 60 रुपए थी।


अब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने इस मुद्दे पर ध्यान केंद्रित किया है और सरकार से आग्रह किया है कि रुपए की कीमत को किसी भी हाल में गिरने नहीं दिया जाना चाहिए। आरएसएस के आर्थिक प्रकोष्ठ, स्वदेशी जागरण मंच ने स्पष्ट किया है कि डॉलर की कीमत सौ रुपए तक नहीं पहुंचनी चाहिए।


आर्थिक विशेषज्ञों की आलोचना

स्वदेशी जागरण मंच ने केवल इतना ही नहीं कहा, बल्कि जब दो अर्थशास्त्रियों ने रुपए की गिरती कीमत को स्वीकार करने की बात की, तो उनके खिलाफ भी मोर्चा खोला। गीता गोपीनाथ और अरविंद पनगढ़िया ने सुझाव दिया कि रुपए की गिरावट को रोकने के लिए बाजार में डॉलर बेचने का विकल्प नहीं अपनाना चाहिए, जिस पर स्वदेशी जागरण मंच ने उनकी आलोचना की।


अब यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार अर्थशास्त्रियों की सलाह मानती है या स्वदेशी जागरण मंच की बातों को ध्यान में रखते हुए डॉलर के मुकाबले रुपए की गिरती कीमत को रोकने के लिए अन्य उपाय करती है। फिलहाल, सरकार के पास अपने विदेशी मुद्रा भंडार से डॉलर निकालने के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं दिखाई दे रहा है। निवेश में वृद्धि नहीं हो रही है और आयात बिल में तत्काल कमी आने की कोई संभावना नहीं है।