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भारतीय खेलों के दिग्गज रणधीर सिंह का निधन: एक युग का अंत

भारतीय खेलों के महान निशानेबाज और प्रशासक रणधीर सिंह का निधन हो गया है। उन्होंने एशियाई खेलों में भारत के लिए पहला स्वर्ण पदक जीता और खेल प्रशासन में भी कई महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ हासिल की। उनके योगदान को याद करते हुए खेल प्रेमियों में शोक की लहर है। जानें उनके जीवन और उपलब्धियों के बारे में इस लेख में।
 

रणधीर सिंह का निधन


नई दिल्ली: भारतीय खेलों के इतिहास में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले महान निशानेबाज और खेल प्रशासक रणधीर सिंह का निधन बुधवार को हुआ। उन्होंने 79 वर्ष की आयु में अंतिम सांस ली। रणधीर सिंह ऐसे अद्वितीय व्यक्तित्व थे जिन्होंने खेल के क्षेत्र में और अंतरराष्ट्रीय संगठनों में भारत का नाम रोशन किया।


एशियाई खेलों में पहला स्वर्ण

पहला स्वर्ण पदक


रणधीर सिंह ने एशियाई खेलों में निशानेबाजी में भारत के लिए पहला स्वर्ण पदक जीता। उनके निधन की सूचना मिलते ही खेल प्रेमियों और ओलंपिक समुदाय में शोक की लहर दौड़ गई।


खेल प्रशासन में योगदान

खेल प्रशासन में भी स्थापित किए नए कीर्तिमान


खेल से संन्यास लेने के बाद, रणधीर सिंह ने खेल प्रशासन में कई महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ हासिल कीं। वह 2024 में 'ओलंपिक काउंसिल ऑफ एशिया' (OCA) के 44वें जनरल असेंबली में निर्विरोध अध्यक्ष चुने जाने वाले पहले भारतीय बने। हालांकि, स्वास्थ्य कारणों से उनका कार्यकाल समय से पहले समाप्त हो गया।


मानद सदस्यता और परिवार का योगदान

मानद सदस्य का दर्जा


रणधीर सिंह ने 1987 से 2012 तक 'भारतीय ओलंपिक संघ' (IOA) के महासचिव के रूप में 25 वर्षों तक कार्य किया। इसके अलावा, वह 2001 से 2014 तक 'अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक कमेटी' (IOC) के सक्रिय सदस्य रहे और बाद में उन्हें मानद सदस्य का दर्जा दिया गया।


सफर स्वर्ण अक्षरों में लिखा


उनका खेल पृष्ठभूमि से जुड़ा परिवार भी उनके सफर में महत्वपूर्ण रहा। उनके पिता भलिंद्र सिंह भी एक प्रसिद्ध खेल प्रशासक थे, जिन्होंने भारतीय ओलंपिक संघ के अध्यक्ष के रूप में खेलों की नींव रखी। रणधीर सिंह का निधन भारतीय खेल कूटनीति के लिए एक बड़ा नुकसान है।


1978 बैंकॉक गेम्स में स्वर्णिम पल

1978 बैंकॉक गेम्स का ऐतिहासिक स्वर्णिम पल


रणधीर सिंह ने 1978 में बैंकॉक में आयोजित एशियाई खेलों में व्यक्तिगत ट्रैप इवेंट में स्वर्ण पदक जीता, जिसने भारतीय शूटिंग को नई दिशा दी। उनके खेल के प्रति समर्पण और निरंतरता अद्वितीय थी।


अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित

'अर्जुन पुरस्कार' से सम्मानित


उन्होंने 1968 से 1984 तक लगातार पांच बार ओलंपिक खेलों में भारत का प्रतिनिधित्व किया, जो उनकी उत्कृष्ट फिटनेस और खेल कौशल का प्रमाण है। उनके इस योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें 1979 में प्रतिष्ठित 'अर्जुन पुरस्कार' से सम्मानित किया।