भारत की आर्थिक चुनौतियाँ: चीन से सीखने की आवश्यकता
भारत में आर्थिक संकट का सामना
भारत आज एक गंभीर आर्थिक संकट का सामना कर रहा है, जिसका मुख्य कारण 1991 के बाद से पूंजी के प्रति राज्य का पूर्ण समर्पण है। इसके साथ ही यह सवाल भी उठता है कि नेहरूवादी नीतियों के तहत भारत में सार्वजनिक उद्यम स्थापित किए गए, लेकिन देश का औद्योगिक क्षेत्र वैश्विक प्रतिस्पर्धा में क्यों पिछड़ गया? क्यों कुशल इन्फ्रास्ट्रक्चर और निर्यात क्षमता हासिल करने में असफल रहा? इन सवालों के उत्तर ऐतिहासिक संदर्भ में छिपे हुए हैं।
एक अंग्रेजी समाचार पत्र के ऑप-एड में प्रकाशित एक टिप्पणी ने ध्यान आकर्षित किया- ‘आर्थिक विकास के लिए चाहिए अर्जुन, अथवा देंग की तरह एकाग्रता।’ यह टिप्पणी किसी अर्थशास्त्री की नहीं, बल्कि एक प्रसिद्ध वकील की है। यहां 'देंग' से तात्पर्य चीन के पूर्व नेता देंग श्याओपिंग से है।
जब से भारत की आर्थिक महाशक्ति बनने की कहानी कमजोर हुई है, तब से मीडिया और आम चर्चाओं में चीन के उदाहरणों का उल्लेख बढ़ गया है। इस वर्ष जब भारतीय अर्थव्यवस्था की गिरावट और गंभीर आर्थिक संकट का अहसास हुआ है, तो इस विषय पर चर्चाएँ तेज हो गई हैं।
कुछ साल पहले तक भारत में चीन के विकास की चर्चा करना जोखिम भरा था। ऐसा करने वाले को चीन का एजेंट मान लिया जाता था। उस समय यह कहा जाता था कि भारत चीन का प्रतिस्पर्धी है और लोकतंत्र के साथ तेजी से विकास कर रहा है।
अब स्थिति बदल गई है। अब पश्चिमी देशों के साथ-साथ भारतीय मीडिया में भी चीन की प्रगति की चर्चा हो रही है। भारत में यह अहसास हो रहा है कि 'हम पीछे रह गए हैं'। हालांकि, चीन की प्रगति के पीछे के कारणों की चर्चा अक्सर भ्रामक होती है।
गलत निष्कर्ष यह है कि चीन की सभ्यता में ऐसे तत्व हैं, जिन्होंने उसकी विकास यात्रा को आसान बनाया। या फिर देंग श्याओपिंग कोई करिश्माई नेता थे। वास्तव में, 1839-42 के अफीम युद्ध में चीन को ब्रिटेन द्वारा पराजित किया गया था, जिससे उसकी सभ्यता को अपमानित किया गया।
देंग के योगदान को संदर्भ में देखना आवश्यक है। 1949 की क्रांति के बाद चीन ने क्या हासिल किया, इसे जानने के लिए 1981 में विश्व बैंक की रिपोर्ट पर ध्यान देना चाहिए।
विश्व बैंक की रिपोर्ट में कहा गया था कि चीन आर्थिक रूप से गरीब था, लेकिन शिक्षा, स्वास्थ्य और जीवन प्रत्याशा जैसे सामाजिक संकेतकों में उसने उल्लेखनीय प्रगति की। इस दौरान:
- प्राथमिक शिक्षा का व्यापक प्रसार हुआ।
- साक्षरता दर में वृद्धि हुई।
- ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं ने बुनियादी चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराईं।
- संक्रामक रोगों पर नियंत्रण और टीकाकरण अभियान सफल रहे।
- 1949 में औसत जीवन प्रत्याशा 35 वर्ष थी, जो 1970 के दशक तक 65 वर्ष तक पहुंच गई।
- महिलाओं के अधिकारों में सुधार हुआ।
इन मजबूत आधारों पर देंग श्याओपिंग ने 'सुधार और दरवाजे खोलने' की नीति अपनाई। कोई भी गंभीर अध्ययनकर्ता यह नहीं कह सकता कि माओ के समय की नींव के बिना देंग की नीतियाँ सफल हो सकती थीं।
भारत ने स्वतंत्रता के बाद अलग रास्ता चुना, लेकिन विकास की चुनौतियाँ दोनों देशों के लिए समान थीं। दोनों देशों ने अपनी विकास यात्रा लगभग समान समय पर शुरू की।
नेहरू ने चीन की नीतियों से सीखने की कोशिश की थी। 1955 में चीन के अर्थशास्त्री चेन हानसेंग भारत आए थे, और नेहरू ने उनसे लंबी बातचीत की थी।
हालांकि, आज यह कहना उचित होगा कि 'भविष्य' अब आ चुका है। लेकिन इस मायूसी में गलत निष्कर्ष निकालने और खुद को कोसने की आवश्यकता नहीं है। असल में, यह नीतियाँ और पहलू हैं, जिन्होंने चीन के विकास को सुनिश्चित किया।
भारत में आज भी उद्यमियों, बाजार, और तकनीकी कौशल की कमी नहीं है। लेकिन यदि भारत को आगे बढ़ना है, तो उसे यह समझना होगा कि राज्य और पूंजी के बीच का संबंध कैसे होना चाहिए।
क्या भारत इस चर्चा के लिए तैयार है कि राज्य कैसे इतना सक्षम बने, जिससे वह पूंजी को नियंत्रित कर सके? यदि नहीं, तो फिर चीन से सीखने का कोई लाभ नहीं होगा।
