भाजपा ने नानाजी देशमुख चंद्रशेखर आजाद को किया याद

जम्मू, 27 फ़रवरी (हि.स.)।जम्मू-कश्मीर भाजपा के अध्यक्ष सत शर्मा सीए, महासचिव (संगठन) अशोक कौल, महासचिव और विधायक डॉ. देविंदर कुमार मन्याल, एनईएम प्रिया सेठी, प्रो. (डॉ.) कुलभूषण मोहत्रा और अन्य ने नानाजी देशमुख और चंद्रशेखर आजाद को उनकी पुण्यतिथि पर याद किया। उन्होंने इन दोनों महान भारतीय देशभक्तों को पुष्पांजलि अर्पित की।
इस अवसर पर सत शर्मा ने कहा कि नानाजी देशमुख जिन्हें चंडिकादासनृतराव देशमुख के नाम से भी जाना जाता है का जन्म 11 अक्टूबर 1916 को महाराष्ट्र के हिंगोली जिले के एक छोटे से शहर में अमृतराव देशमुख और राजाबाई अमृतराव देशमुख के घर हुआ था। कम उम्र में ही उन्होंने अपने माता-पिता को खो दिया हालाँकि वे बड़े होकर एक समर्पित सामाजिक कार्यकर्ता बन गए और शिक्षा, स्वास्थ्य और ग्रामीण आत्मनिर्भरता के क्षेत्र में भी काम किया। उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था। नानाजी देशमुख लोकमान्य तिलक और उनकी राष्ट्रवादी विचारधारा से प्रेरित थे। वे डॉ. केशव बाजीराम हेडगेवार और दीन दयाल उपाध्याय जैसे प्रख्यात नेताओं के भी निकट संबंध में थे जिनसे उनकी पहली मुलाकात वर्ष 1940 में हुई थी।
1947 में दो पत्रिकाओं राष्ट्रधर्म और पांचजन्य, और स्वदेश नामक एक समाचार पत्र के शुभारंभ पर, श्री अटल विहारी वाजपेयी को संपादक की जिम्मेदारी सौंपी गई और दीन दयाल उपाध्याय को प्रबंध निदेशक के रूप में नानाजी के साथ मार्गदर्शक बनाया गया। नानाजी देशमुख को महासचिव के रूप में उत्तर प्रदेश में भारतीय जनसंघ का प्रभार दिया गया था। देशमुख 1957 तक भारतीय जनसंघ ने उत्तर प्रदेश के प्रत्येक जिले में अपनी इकाईयाँ स्थापित कर ली थीं और इसका श्रेय नानाजी को जाता है जिन्होंने पूरे राज्य में व्यापक यात्राएँ की थीं और कड़ी मेहनत की थी। नानाजी देशमुख ने विनोबा भावे द्वारा शुरू किए गए भूदान आंदोलन में भी सक्रिय रूप से भाग लिया। उन्होंने विनोबा के साथ दो महीने बिताए और आंदोलन की सफलता और अपील से बहुत प्रेरित हुए। बाद में जब जयप्रकाश नारायण ने संपूर्ण क्रांति का आह्वान किया तो नानाजी ने इस आंदोलन को पूर्ण समर्थन देकर जवाब दिया। नानाजी देशमुख 1977 में उत्तर प्रदेश के बलरामपुर लोकसभा क्षेत्र से चुने गए। उन्हें कैबिनेट पोर्टफोलियो की पेशकश की गई जिसे उन्होंने अस्वीकार कर दिया।
अशोक कौल ने कहा कि, 1980 में जब वे 60 वर्ष के हुए तो उन्होंने राजनीति से बाहर निकलने का विकल्प चुना और खुद को पूरी तरह से सामाजिक और रचनात्मक कार्यों में समर्पित कर दिया आश्रमों में रहने लगे और कम प्रोफ़ाइल बनाए रखा। उन्होंने गरीबी उन्मूलन और न्यूनतम आवश्यकता कार्यक्रम की दिशा में अग्रणी कार्य किया। उनके काम के अन्य क्षेत्र कृषि और कुटीर उद्योग, ग्रामीण स्वास्थ्य और शिक्षा थे। नानाजी ने दीनदयाल शोध संस्थान (डीआरआई) की अध्यक्षता संभाली जिसकी स्थापना उन्होंने पंडित दीनदयाल उपाध्याय द्वारा प्रतिपादित एकात्म मानववाद के दर्शन को मान्य करने के लिए 1972 में की थी। एकात्म मानववाद ने भारत के लिए एक ऐसा दृष्टिकोण दिया कि मनुष्य और समाज के साथ उसके संबंधों के प्रति एक अभिन्न और पूरक दृष्टिकोण के साथ भारत को बदला जा सकता है और इसे दुनिया के लिए अनुसरण करने योग्य एक आत्मनिर्भर और दयालु उदाहरण में बदला जा सकता है।
डॉ. देविंदर मन्याल ने कहा कि नानाजी ने एकात्म मानववाद के आधार पर ग्रामीण क्षेत्रों के विकास के लिए एक मॉडल प्रस्तुत किया। गोंडा (यू.पी.) और बीड (महाराष्ट्र) में शुरुआती प्रयोगों के बाद नानाजी ने एक ऐसा कार्यक्रम तैयार किया,जिसमें स्वास्थ्य, स्वच्छता, शिक्षा, कृषि, आय सृजन, संसाधनों का संरक्षण और सामाजिक चेतना को शामिल किया गया, जो टिकाऊ और अनुकरणीय दोनों है।
हिन्दुस्थान समाचार / बलवान सिंह