ईरान के भविष्य में रजा पहलवी की भूमिका: क्या लौटेंगे क्राउन प्रिंस?
रजा पहलवी: एक नई शुरुआत की ओर
नई दिल्ली: एक समय था जब रजा पहलवी के पास धन, शाही ठाठ और महलों की सुरक्षा थी, लेकिन उनका एकमात्र साथी एक कुत्ता था। आज वही बच्चा ईरान की सड़कों पर गूंजते नारों का केंद्र बन गया है। 1970 के दशक की एक पुरानी तस्वीर से लेकर 2025 के विरोध प्रदर्शनों तक, रजा की कहानी अब केवल अतीत नहीं, बल्कि ईरान के भविष्य से भी जुड़ती नजर आ रही है।
विरोध प्रदर्शनों का विस्तार
दिसंबर 2025 के अंत में ईरान में भड़के विरोध अब केवल महंगाई और बेरोजगारी तक सीमित नहीं रह गए हैं। यह आंदोलन इस्लामिक रिपब्लिक के खिलाफ एक व्यापक जन विद्रोह का रूप ले चुका है। इस उथल-पुथल के बीच रजा पहलवी का नाम सबसे अधिक सुनाई दे रहा है, जो ईरान के अंतिम शाह मोहम्मद रजा पहलवी के बड़े बेटे और क्राउन प्रिंस हैं।
पुरानी तस्वीर और 'सोने का पिंजरा'
रजा पहलवी का जन्म 31 अक्टूबर 1960 को तेहरान में हुआ था, और उन्हें जन्म के साथ ही क्राउन प्रिंस का दर्जा मिला। उनके पिता, मोहम्मद रजा शाह, उस समय ईरान के शक्तिशाली शासक थे। रजा को फ्रेंच गवर्नेस ने पाला और उन्हें निजी पैलेस स्कूलों में पढ़ाया गया।
हालांकि, यह वैभव तन्हाई के साथ आया। सोशल मीडिया पर वायरल हो रही 1978 की एक पत्रिका की कटिंग में लिखा था, 'दुनिया का सबसे अमीर बच्चा, जिसका दोस्त सिर्फ उसका कुत्ता है।' रिपोर्ट के अनुसार, उनका सबसे करीबी साथी उनका स्पैनियल कुत्ता 'जूडी' था।
1979 की क्रांति और निर्वासन
1979 में इस्लामी क्रांति के बाद सब कुछ बदल गया। शाह को देश छोड़ना पड़ा और रजा पहलवी अचानक 'दुनिया का सबसे हाई-प्रोफाइल रिफ्यूजी' बन गए। उन्होंने अमेरिका में निर्वासन की जिंदगी बिताई और अपने देश को दूर से टूटते देखा।
ईरान की सड़कों पर गूंजता नाम
2023 से 2025 के बीच हालात तेजी से बदले। दिसंबर 2025 में तेहरान के ग्रैंड बाजार से शुरू हुए प्रदर्शन पूरे देश में फैल गए। इंटरनेट बंद कर दिया गया, सैकड़ों मौतें हुईं और हजारों गिरफ्तारियां हुईं, लेकिन लोग पीछे नहीं हटे।
इन रैलियों में एक नारा बार-बार सुनाई दिया - 'रजा शाह, रूहता शाद' और 'ए शहजादे, वापस आओ।'
रजा पहलवी की अपील
जनवरी में रजा पहलवी ने एक वीडियो संदेश जारी कर लोगों से शाम आठ बजे एक साथ नारे लगाने और शहरों के केंद्रों पर कब्जा करने की अपील की। उन्होंने कहा, 'मैं जल्द ही अपनी मातृभूमि में वापस आऊंगा।' इसके बाद सड़कों पर 'मौत बर खामनेई' के साथ 'पहलवी वापस आएगा' के नारे भी गूंजे।
लोगों की उम्मीदें
आर्थिक बदहाली, रियाल की गिरावट और महंगाई से लोग त्रस्त हैं। उन्हें शाह के दौर की मजबूत अर्थव्यवस्था याद आती है। महसा अमीनी की मौत के बाद युवा पीढ़ी धार्मिक सख्ती से उब चुकी है। ऐसे में रजा पहलवी एकता के प्रतीक बनकर उभरे हैं।
लोकतंत्र की ओर कदम
हालांकि, सभी लोग राजशाही नहीं चाहते। कुछ नारे लगाते हैं - 'न शाह, न मुल्ला।' लेकिन रजा पहलवी खुद कहते हैं, 'मुझे सत्ता नहीं चाहिए, मैं बस अपने लोगों को चुनने का अधिकार देना चाहता हूं।'
