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कोट्टनकुलंगरा देवी मंदिर: पुरुषों का अनोखा रूप धारण करने का उत्सव

केरल के कोट्टनकुलंगरा देवी मंदिर में पुरुषों को देवी के दर्शन के लिए महिलाओं का रूप धारण करना पड़ता है। वार्षिक 'चामयाविलक्कु' उत्सव के दौरान, पुरुष पारंपरिक साड़ियां पहनकर सजते हैं। इस परंपरा के पीछे एक दिलचस्प पौराणिक कथा है, जो इसे और भी खास बनाती है। जानें इस अद्भुत उत्सव के बारे में और कैसे यह परंपरा आज भी जीवित है।
 

कोट्टनकुलंगरा देवी मंदिर का अद्भुत नियम


नई दिल्ली: भारत की विविधता और धार्मिक आस्था के अनूठे रूपों के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है, लेकिन केरल के कोल्लम जिले में स्थित कोट्टनकुलंगरा देवी मंदिर का नियम सबसे अलग और अद्भुत है। इस ऐतिहासिक मंदिर में देवी मां के दर्शन के लिए पुरुषों को पारंपरिक कपड़े छोड़कर महिलाओं का रूप धारण करना पड़ता है। वार्षिक 'चामयाविलक्कु' उत्सव के दौरान यह दृश्य न केवल देश के लोगों के लिए, बल्कि विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए भी आकर्षण का केंद्र बन जाता है। इस अवसर पर पुरुष पारंपरिक रेशमी साड़ियां और लहंगे पहनते हैं, साथ ही माथे पर सिंदूर, बिंदी, आंखों में काजल, होठों पर लिपस्टिक और बालों में गजरा लगाकर सजते हैं।


सोलह श्रृंगार से सजा मंदिर

इस वार्षिक उत्सव के दौरान मंदिर का माहौल किसी भव्य सौंदर्य प्रतियोगिता जैसा होता है, जहाँ हजारों पुरुष दुल्हन की तरह सज-धजकर आते हैं। इस दौरान, भक्तों की तैयारी को आसान बनाने के लिए मंदिर परिसर और आसपास के क्षेत्रों में ब्यूटी पार्लर और मेकअप आर्टिस्ट के स्टॉल लगाए जाते हैं।


पौराणिक कथा का महत्व

पुरानी पौराणिक कथा

पुरुषों द्वारा नारी रूप धारण करने की इस परंपरा के पीछे एक दिलचस्प पौराणिक कथा है। मान्यता है कि प्राचीन काल में कुछ चरवाहे खेल-खेल में लड़कियों के वस्त्र पहनकर एक पवित्र पत्थर की पूजा करते थे। उसी समय भगवती देवी प्रकट हुईं और उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें आशीर्वाद दिया। तब से यह विश्वास बना हुआ है कि यदि कोई पुरुष सच्चे मन से स्त्री का रूप धारण कर देवी के दरबार में आता है, तो मां उसकी हर इच्छा पूरी करती हैं।


वैश्विक पहचान का सफर

अनूठी परंपरा का विस्तार

समय के साथ इस अनोखी परंपरा का दायरा बढ़ गया है। पहले केवल स्थानीय ग्रामीण ही इस अनुष्ठान का हिस्सा बनते थे, लेकिन अब देश के विभिन्न राज्यों और विदेशों से भी लोग इस खास मौके पर कोट्टनकुलंगरा देवी मंदिर आते हैं। आधुनिकता के बावजूद, इस सदियों पुरानी आस्था का स्वरूप आज भी पूरी पवित्रता और उत्साह के साथ कायम है।