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गुरु पूर्णिमा: श्रद्धा और सम्मान का पर्व

गुरु पूर्णिमा, जो आषाढ़ पूर्णिमा के दिन मनाई जाती है, एक महत्वपूर्ण पर्व है। इस दिन गुरु, माता-पिता और शिक्षकों के प्रति सम्मान व्यक्त किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन कुछ कार्यों से बचना चाहिए और श्रद्धा से गुरु की पूजा करनी चाहिए। जानें इस पर्व से जुड़ी अन्य मान्यताएँ और परंपराएँ, जैसे कि तुलसी से जुड़ी परंपरा और सात्विक भोजन का महत्व।
 

गुरु पूर्णिमा का महत्व


नई दिल्ली: आषाढ़ पूर्णिमा के अवसर पर मनाई जाने वाली गुरु पूर्णिमा एक महत्वपूर्ण पर्व है, जो सनातन परंपरा में विशेष स्थान रखता है। इस दिन गुरु, माता-पिता, शिक्षकों और ज्ञान देने वाले सभी व्यक्तियों के प्रति सम्मान प्रकट किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन श्रद्धा और भक्ति से गुरु की पूजा करने से ज्ञान, सफलता और जीवन में सकारात्मकता का आशीर्वाद प्राप्त होता है।


गुरु पूर्णिमा पर क्या न करें?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, गुरु पूर्णिमा के दिन कुछ कार्यों से बचना चाहिए। ऐसा माना जाता है कि इन बातों का ध्यान रखने से पूजा का महत्व बढ़ता है और गुरु की कृपा प्राप्त होती है।


इस दिन सबसे पहले गुरु, शिक्षक, माता-पिता, बुजुर्ग या किसी भी सम्माननीय व्यक्ति का अपमान नहीं करना चाहिए। कटु वचन बोलने, उपहास करने या अनादर करने से बचने की सलाह दी जाती है।


गुरु के सामने हमेशा विनम्रता बनाए रखना आवश्यक है। उनके सामने ऊंचे आसन पर बैठने या अहंकार का प्रदर्शन करने से बचना चाहिए, क्योंकि यह सम्मान और श्रद्धा का प्रतीक माना जाता है।


गुरु पूर्णिमा की अन्य मान्यताएँ

गुरु पूर्णिमा के दिन सात्विक भोजन करने की परंपरा है। कई लोग इस दिन व्रत रखते हैं और मांस, मदिरा, प्याज, लहसुन तथा बासी भोजन से परहेज करते हैं।


गुरु के पास खाली हाथ नहीं जाना चाहिए। श्रद्धा के अनुसार फल, फूल, मिठाई, वस्त्र या दक्षिणा अर्पित की जा सकती है। काले रंग के वस्त्र, नुकीली वस्तुएं या अनुपयुक्त उपहार देने से बचने की सलाह दी जाती है।


तुलसी से जुड़ी परंपरा

गुरु पूर्णिमा के दिन तुलसी के पत्ते नहीं तोड़े जाते। यदि पूजा में तुलसी की आवश्यकता हो, तो उन्हें एक दिन पहले ही तोड़कर रखने की सलाह दी जाती है।


सूर्योदय से पहले उठकर स्नान, ध्यान और पूजा करना शुभ माना जाता है। इस दिन घर में विवाद, क्रोध और कलह से बचने की सलाह दी जाती है, जिससे घर का वातावरण सकारात्मक बना रहता है।


यदि किसी व्यक्ति के जीवन में कोई जीवित गुरु नहीं हैं या वे अपने गुरु से दूर हैं, तो भगवान श्रीकृष्ण, भगवान शिव या महर्षि वेद व्यास को गुरु स्वरूप मानकर उनकी पूजा की जा सकती है। गुरु पूर्णिमा का मुख्य संदेश ज्ञान, विनम्रता, सेवा और कृतज्ञता का भाव अपनाना है।