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गुरु प्रदोष व्रत: तिथि, पूजा विधि और महत्व

गुरु प्रदोष व्रत का विशेष महत्व है, जो भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित है। इस व्रत के दौरान भक्तों को सुख-समृद्धि और कष्टों से मुक्ति की प्राप्ति होती है। जानें इस व्रत की तिथि, पूजा विधि और मंत्रों के बारे में, जो इस दिन को और भी खास बनाते हैं।
 

प्रदोष व्रत का महत्व

हिंदू धर्म में प्रदोष व्रत का एक विशेष स्थान है। यह व्रत भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित होता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जो लोग प्रदोष व्रत का पालन करते हैं, उन्हें जीवन में सुख और समृद्धि प्राप्त होती है, साथ ही कष्टों से मुक्ति भी मिलती है। हर महीने की कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष में पड़ने वाली त्रयोदशी तिथि को प्रदोष कहा जाता है। आज, यानी 01 जनवरी 2026 को गुरु प्रदोष व्रत मनाया जा रहा है, जो इस वर्ष का पहला प्रदोष व्रत है। आइए जानते हैं गुरु प्रदोष व्रत की तिथि, मुहूर्त, पूजा विधि और इसके महत्व के बारे में...


तिथि और मुहूर्त

हिंदू पंचांग के अनुसार, पौष माह के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि की शुरुआत 31 दिसंबर की रात 01:47 बजे होगी। वहीं, यह तिथि 01 जनवरी 2026 की रात 10:22 बजे समाप्त होगी। भगवान शिव की पूजा के लिए प्रदोष काल का समय शाम 05:35 बजे से लेकर रात 08:19 बजे तक रहेगा।


पूजन विधि

इस दिन सुबह जल्दी स्नान करने के बाद स्वच्छ वस्त्र पहनें और सूर्य देव को जल अर्पित करें। फिर भगवान शिव का ध्यान करते हुए हाथ में जल, फूल और अक्षत लेकर व्रत का संकल्प लें। शिव मंदिर जाकर शिवलिंग का जलाभिषेक करें और भगवान शिव को सफेद वस्तुओं का भोग अर्पित करें। इसके बाद भगवान शिव और माता पार्वती की विधिपूर्वक पूजा करें और गुरु प्रदोष व्रत कथा सुनें। पूजा के बाद आरती करें और शिव मंत्रों का जाप करें।


यह भी ध्यान रखें कि प्रदोष काल में भगवान शिव की पूजा करना अत्यंत शुभ माना जाता है। प्रदोष काल में पुनः स्नान करें और साफ कपड़े पहनें। फिर गंगाजल से पूजा स्थल को पवित्र करें। इसके बाद भगवान शिव को धतूरा, बेलपत्र, भांग, सफेद फूल, गन्ना, गुड़हल, भस्म, मदार का फूल, रोली, चंदन, फल और मिठाई आदि अर्पित करें। 'ऊँ नम: शिवाय' मंत्र का जाप करें और प्रदोष व्रत कथा का पाठ करके भगवान शिव की आरती करें।


मंत्र

ॐ नमः शिवाय


ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्॥


कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम्। सदा वसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानी सहितं नमामि॥


ॐ साम्ब सदाशिवाय नमः