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गोरखनाथ मंदिर में खिचड़ी का धार्मिक महत्व और मेला

गोरखनाथ मंदिर में खिचड़ी चढ़ाने की परंपरा सदियों पुरानी है, जो मकर संक्रांति के अवसर पर विशेष महत्व रखती है। इस मंदिर में खिचड़ी का प्रसाद अर्पित किया जाता है, जो भारतीय संस्कृति में संयम और सात्विकता का प्रतीक है। गोरखपुर का खिचड़ी मेला श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है, और यहां खिचड़ी का वितरण बड़े पैमाने पर किया जाता है। जानें इस धार्मिक परंपरा के पीछे की कहानियां और मान्यताएं।
 

खिचड़ी: भारतीय संस्कृति का प्रतीक


नई दिल्ली: खिचड़ी को कभी साधारण भोजन और कभी रोगियों के लिए उत्तम आहार माना जाता है। भारतीय संस्कृति में इसे सात्विकता और संयम का प्रतीक माना गया है। समय के साथ, खिचड़ी ने धार्मिक महत्व भी ग्रहण किया और कई मंदिरों में यह प्रसाद और भोग का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई है।


गोरखनाथ मंदिर का खिचड़ी चढ़ाने का परंपरा

गोरखपुर का गोरखनाथ मंदिर इस परंपरा का प्रमुख केंद्र है। यहां सदियों से मकर संक्रांति के अवसर पर खिचड़ी चढ़ाई जाती है, जो अब खिचड़ी मेले का रूप ले चुकी है। इस मेले में दूर-दूर से श्रद्धालु शामिल होते हैं।


मंदिरों में खिचड़ी का महत्व

ओडिशा के जगन्नाथ मंदिर में भगवान को खिचड़ी का भोग अर्पित किया जाता है। उत्तर प्रदेश के गोरखपुर, हिमाचल के ज्वाला देवी मंदिर, झारखंड के अंबाजी मंदिर और बिहार के कई शक्तिपीठों में खिचड़ी बलि के साथ या उसके स्थान पर प्रसाद के रूप में चढ़ाई जाती है। यहां श्रद्धालुओं को बड़े पैमाने पर खिचड़ी प्रसाद वितरित किया जाता है।


गोरखपुर का खिचड़ी मेला

गोरखनाथ मंदिर के खिचड़ी मेले का नाम सुनते ही श्रद्धालुओं के मन में उत्साह भर जाता है। यूपी के मुख्यमंत्री महंत योगी आदित्यनाथ गोरखपुर की राजनीति से निकलकर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने हैं। गोरखनाथ मंदिर लंबे समय से पूर्वांचल की राजनीति और सामाजिक चेतना का केंद्र रहा है। यहां खिचड़ी चढ़ाने की परंपरा सदियों पुरानी है, जिसने गोरखपुर को मकर संक्रांति का प्रमुख तीर्थ बना दिया है।


बाबा गोरखनाथ और नाथ संप्रदाय

बाबा गोरखनाथ को सात्विक जीवन और योग साधना का प्रतीक माना जाता है। उन्हें खिचड़ी अर्पित की जाती है। बाबा का प्रभाव नेपाल के राजवंशों तक रहा है, और नेपाल के राजपरिवार से भी यहां खिचड़ी चढ़ाने की परंपरा लंबे समय तक चली।


ज्वालाजी मंदिर से जुड़ी कथा

गोरखनाथ मंदिर का संबंध हिमाचल प्रदेश के मां ज्वाला जी मंदिर से जोड़ा जाता है। कथा के अनुसार, बाबा गोरखनाथ मां ज्वाला धाम पहुंचे, जहां देवी बलि स्वीकार करती थीं। बाबा ने कहा कि वह सात्विक भोजन करते हैं, तब माता ने दाल-चावल लाने को कहा और खिचड़ी बनाने के लिए पानी उबालने लगीं।


उबलते जल और प्रतीक्षा की मान्यता

मान्यता है कि ज्वालाजी मंदिर के पास स्थित गोरखडिब्बी में आज भी खिचड़ी के लिए पानी उबल रहा है। बाबा गोरखनाथ खिचड़ी मांगते हुए गोरक्षपुरी पहुंचे और वहीं समाधि में बैठ गए। उनका खप्पर वहीं रह गया, जिसमें खिचड़ी चढ़ाई जाती है। माना जाता है कि वह खप्पर आज तक नहीं भरा और मां ज्वाला आज भी अपने भक्त की प्रतीक्षा कर रही हैं।