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चैती छठ पूजा: भक्ति और समृद्धि का चार दिवसीय पर्व

छठ पूजा, जो साल में दो बार मनाई जाती है, इस बार चैत्र महीने में शुरू हो चुकी है। यह चार दिवसीय पर्व भक्ति और परिवार की समृद्धि का प्रतीक है। पहले दिन 'नहाय-खाय' के साथ व्रती महिलाएं पवित्रता का संकल्प लेती हैं, जबकि दूसरे दिन 'खरना' मनाया जाता है। तीसरे दिन सूर्य को अर्घ्य देने की प्रक्रिया होती है, और चौथे दिन निकलते सूरज की पूजा की जाती है। जानें इस पर्व की विशेषताएँ और मान्यताएँ।
 

छठ पूजा का महत्व

छठ पर्व साल में दो बार मनाया जाता है, एक बार दीवाली के बाद और दूसरी बार चैत्र महीने में। आज से चैती छठ पूजा का आरंभ हो चुका है। यह चार दिवसीय उत्सव भक्ति, पवित्रता और परिवार की समृद्धि का प्रतीक है। इस अवसर पर व्रती सूर्य देव की पूजा करती हैं और परिवार के सुख, संतान की लंबी उम्र और स्वास्थ्य की कामना करती हैं।


नहाय-खाय का दिन

छठ के पहले दिन, जिसे 'नहाय-खाय' कहा जाता है, व्रती महिलाएं सुबह स्नान कर पवित्रता का संकल्प लेती हैं। इसके बाद वे सात्विक भोजन का सेवन करती हैं, जिसमें खासतौर पर कद्दू की सब्जी और चावल का प्रसाद शामिल होता है। परिवार के सभी सदस्य इस भोजन में भाग लेते हैं, जिससे तन-मन की शुद्धि होती है और आगे के व्रत की तैयारी होती है।


खरना का महत्व

नहाय-खाय के अगले दिन 'खरना' मनाया जाता है। इस दिन व्रती पूरे दिन उपवास रखती हैं और शाम को ईख के रस, गुड़ से बनी खीर, पूड़ी, केला और अन्य सात्विक चीजों का नैवेद्य चढ़ाती हैं। प्रसाद ग्रहण करने के बाद 36 घंटे का कठिन निर्जला व्रत शुरू होता है, जिसमें व्रती को पानी भी नहीं पीना होता। यह व्रत उनकी भक्ति और धैर्य की परीक्षा होती है।


अर्घ्य देने की प्रक्रिया

तीसरे दिन, व्रती महिलाएं शाम को अपने आसपास के नदी या तालाब जाकर डूबते सूर्य को अर्घ्य देती हैं। यदि नदी या तालाब नहीं है, तो वे घर की छत पर पानी जमा कर ऐसा कर सकती हैं। इसके लिए घर से सूप में फल, ठेकुआ, सुपारी आदि लेकर छठी मैया के गीत गाते हुए घाट तक जाना होता है।


बिहार और यूपी में छठ पूजा

छठ का चौथा और अंतिम दिन बुधवार को होता है, जब निकलते सूरज की पूजा की जाती है। प्रातःकाल की पहली किरणों के साथ व्रती अपना तप पूरा करती हैं। इसके बाद कच्चा दूध और फल ग्रहण कर व्रत का पारण होता है। इस पर्व को कार्तिक और चैत्र के महीने में मनाया जाता है, और यह विशेष रूप से बिहार और यूपी में धूमधाम से मनाया जाता है। भक्त इसे प्रकृति, सूर्य और मातृत्व की पूजा के रूप में मानते हैं।