तुलसी का महत्व: विष्णु और लक्ष्मी पूजा में विशेष नियम
तुलसी का धार्मिक महत्व
नई दिल्ली: हिंदू धर्म में भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी की पूजा का संबंध सुख और समृद्धि से है। विष्णु की पूजा में तुलसी का होना अनिवार्य है, जबकि लक्ष्मी की पूजा में तुलसी का चढ़ाना वर्जित माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, तुलसी को विष्णुप्रिया माना जाता है, इसलिए लक्ष्मी पूजा में इसका उपयोग नहीं किया जाता। सही विधि से पूजा करने पर ही फल की प्राप्ति होती है।
हर देवी-देवता की पूजा से जुड़े कुछ विशेष नियम और परंपराएं होती हैं, जिन्हें जानना आवश्यक है। अक्सर लोग अनजाने में ऐसी चीजें अर्पित कर देते हैं, जो पूजा का फल देने के बजाय दोष का कारण बन जाती हैं। तुलसी और लक्ष्मी पूजा से जुड़ा नियम भी ऐसा ही है, जिसके बारे में भ्रम बना रहता है।
विष्णु पूजा में तुलसी का महत्व
भगवान विष्णु की पूजा में तुलसी का विशेष स्थान है। मान्यता है कि तुलसी के बिना विष्णु पूजा अधूरी मानी जाती है। तुलसी अर्पित करने से श्रीहरि शीघ्र प्रसन्न होते हैं और भक्तों की इच्छाएं पूरी करते हैं। यही कारण है कि हर एकादशी और विष्णु पूजा में तुलसी का चढ़ाना अनिवार्य होता है।
लक्ष्मी पूजा में तुलसी का वर्जित होना
धार्मिक कथाओं के अनुसार, तुलसी को विष्णुप्रिया कहा जाता है और देवउठनी एकादशी पर भगवान विष्णु और तुलसी का विवाह होता है। इसलिए जब केवल मां लक्ष्मी की पूजा की जाती है, तो तुलसी का चढ़ाना नहीं किया जाता। ऐसा माना जाता है कि इससे मां लक्ष्मी अप्रसन्न हो जाती हैं।
तुलसी का स्वरूप
शास्त्रों में तुलसी के पौधे को मां लक्ष्मी का स्वरूप माना गया है। घर में तुलसी का पौधा होना शुभ माना जाता है। रोज तुलसी को जल चढ़ाने और दीपक जलाने से घर में सकारात्मकता बनी रहती है और मां लक्ष्मी का वास होता है।
तुलसी पूजा से समृद्धि की प्राप्ति
सुबह तुलसी को जल देना, परिक्रमा करना और शाम को घी का दीपक जलाना अत्यंत फलदायी माना जाता है। ऐसा करने से भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी दोनों प्रसन्न होते हैं। मान्यता है कि इससे घर में धन, सुख और शांति बनी रहती है।
विष्णु के अवतारों में तुलसी का स्थान
भगवान विष्णु के अवतार जैसे श्रीराम और श्रीकृष्ण की पूजा में भी तुलसी का चढ़ाना होता है। तुलसी अर्पित करने से पूजा का पूर्ण फल मिलता है और भक्तों को आध्यात्मिक संतोष की अनुभूति होती है। यही कारण है कि तुलसी को सनातन धर्म में अत्यंत पवित्र माना गया है।