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दक्षेश्वर महादेव मंदिर: आस्था का केंद्र और पौराणिक कथा

दक्षेश्वर महादेव मंदिर, हरिद्वार के कनखल में स्थित एक प्रमुख धार्मिक स्थल है, जहां देवी सती ने आत्मदाह किया था। इस लेख में हम मंदिर की पौराणिक कथा, यज्ञ कुंड का महत्व और मंदिर के इतिहास के बारे में जानेंगे। सावन और महाशिवरात्रि पर यहां भक्तों की भारी भीड़ होती है। जानें इस मंदिर से जुड़े रोचक तथ्य और इसकी विशेषताएँ।
 

दक्षेश्वर महादेव मंदिर का महत्व

हरिद्वार के कनखल में स्थित दक्षेश्वर महादेव मंदिर, जो दक्ष प्रजापति मंदिर के नाम से भी जाना जाता है, श्रद्धालुओं के लिए एक महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल है। मान्यता के अनुसार, देवी सती ने यहीं अग्निदाह कर अपने प्राणों का त्याग किया था, जिसके बाद भगवान शिव ने प्रलयंकारी तांडव किया। सावन के महीने और महाशिवरात्रि पर यहां भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है, जो दूर-दूर से पूजा-अर्चना और महादेव के दर्शन के लिए आते हैं। इस लेख में हम इस मंदिर से जुड़े कुछ रोचक तथ्यों पर चर्चा करेंगे।


पौराणिक कथा का सार

कथा के अनुसार, देवी सती के पिता राजा दक्ष ने कनखल में एक बड़ा यज्ञ आयोजित किया, जिसमें सभी देवी-देवताओं को आमंत्रित किया गया, लेकिन माता सती और भगवान शिव को निमंत्रण नहीं दिया। माता सती ने भगवान शिव से यज्ञ में जाने की इच्छा व्यक्त की, जिसे उन्होंने पहले मना किया, लेकिन अंततः अनुमति दे दी।


जब देवी सती यज्ञ स्थल पर पहुंचीं, तो राजा दक्ष ने भगवान शिव का अपमान किया। यह सहन न कर पाने के कारण देवी सती ने यज्ञ अग्नि में आत्मदाह कर लिया। भगवान शिव को जब इस घटना का पता चला, तो उन्होंने प्रलयंकारी तांडव किया और राजा दक्ष का सिर काटने के लिए वीरभद्र को भेजा।


यज्ञ कुंड और मंदिर की विशेषताएँ

दक्षेश्वर महादेव मंदिर परिसर में आज भी यज्ञ कुंड मौजूद है, जहां देवी सती ने अपने प्राण त्यागे थे। भक्त बड़ी संख्या में इस कुंड के दर्शन के लिए आते हैं। मंदिर में एक शिवलिंग भी है, जिसकी विशेष पूजा की जाती है।


इसके अलावा, दक्षेश्वर महादेव मंदिर के पास गंगा नदी बहती है, जिसे दक्ष घाट कहा जाता है। भक्त दर्शन और पूजा से पहले इस घाट पर स्नान करते हैं।


मंदिर का निर्माण और जीर्णोद्धार

इस मंदिर का निर्माण 1810 में रानी धनकौर द्वारा किया गया था। इसके बाद, 1962 में मंदिर का जीर्णोद्धार किया गया।