निर्जला एकादशी: महत्व और व्रत कथा
25 जून 2026 को निर्जला एकादशी का व्रत मनाया जा रहा है, जिसे पांडव एकादशी या भीम एकादशी भी कहा जाता है। इस व्रत का पालन करने से सभी पापों से मुक्ति और साल भर की एकादशियों का पुण्य फल प्राप्त होता है। जानें इस व्रत का महत्व और पौराणिक कथा, जिसमें भीमसेन की कहानी शामिल है, जो इस व्रत के माध्यम से भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करते हैं।
Jun 25, 2026, 10:13 IST
निर्जला एकादशी का व्रत
आज, 25 जून 2026 को, निर्जला एकादशी का व्रत मनाया जा रहा है। यह एकादशी ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष में आती है और इसे पांडव एकादशी या भीम एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। पदम पुराण के अनुसार, इस व्रत को करने से व्यक्ति सभी पापों और तापों से मुक्त हो जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने से साल भर की एकादशियों का पुण्य फल प्राप्त होता है। श्रीविष्णु ने मानव कल्याण के लिए 24 एकादशियों का प्रकट किया था, जिसमें पुरुषोत्तम मास की एकादशियाँ भी शामिल हैं। आइए, निर्जला एकादशी के महत्व और व्रत कथा के बारे में विस्तार से जानते हैं...
निर्जला एकादशी का महत्व
निर्जला एकादशी को 'देवव्रत' भी कहा जाता है। इस दिन श्रीविष्णु की कृपा प्राप्त करने के लिए व्रत किया जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, एकादशी में ब्रह्महत्या सहित सभी पापों का शमन करने की शक्ति होती है। इस दिन मन, वचन और कर्म से किसी भी प्रकार के पाप से बचना चाहिए। तामसिक भोजन से भी दूर रहना आवश्यक है।
निर्जला एकादशी की व्रत कथा
एक पौराणिक कथा के अनुसार, धर्मराज युधिष्ठिर ने महर्षि वेदव्यास से निर्जला एकादशी के महत्व के बारे में पूछा। इस दौरान, पांडवों में सबसे शक्तिशाली भीमसेन ने अपनी समस्या साझा की। उन्होंने कहा कि उन्हें भूख अधिक लगती है, जिससे हर एकादशी व्रत करना उनके लिए कठिन है। भीमसेन ने व्यास जी से ऐसा उपाय मांगा जिससे उन्हें सभी एकादशियों का पुण्य मिल सके, बिना बार-बार व्रत किए।
वेदव्यास ने भीमसेन को ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की एकादशी का व्रत करने का सुझाव दिया। उन्होंने बताया कि इस दिन अन्न और जल का सेवन नहीं करना चाहिए। यदि गलती से जल पी लिया जाए, तो व्रत का फल नहीं मिलता। यह व्रत सूर्योदय से लेकर अगले दिन द्वादशी के सूर्योदय तक किया जाता है। द्वादशी के दिन स्नान और दान-पुण्य करके व्रत का पारण किया जाता है। जो भी व्यक्ति इस व्रत को श्रद्धा और विधिपूर्वक करता है, उसे साल भर की 24 एकादशियों का फल और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
भीमसेन ने इस सलाह को मानते हुए निर्जला एकादशी का विधिपूर्वक व्रत किया। भगवान विष्णु की आराधना के बाद, द्वादशी को दान-पुण्य करके व्रत का पारण किया। इस व्रत के प्रभाव से भीमसेन को भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त हुई और उनके सभी पाप समाप्त हो गए। अंततः, भीमसेन को स्वर्ग की प्राप्ति हुई।