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नेपाल में बाढ़ के बाद प्रतीकात्मक अंतिम संस्कार की परंपरा

नेपाल में हाल ही में आई बाढ़ ने कई परिवारों को अपार दुख दिया है, जिसके चलते कई मृतकों के शव नहीं मिल सके हैं। ऐसे में परिवारों ने प्रतीकात्मक अंतिम संस्कार का सहारा लिया है, जिसमें कुश घास से शव जैसी आकृति बनाई जा रही है। यह परंपरा हिंदू धार्मिक ग्रंथों में वर्णित है। जानें इस अनोखी परंपरा के पीछे का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व।
 

नेपाल में बाढ़ का कहर

नई दिल्ली: नेपाल में आई भीषण बाढ़ ने कई परिवारों को अपार दुख दिया है, जिसकी कल्पना करना भी कठिन है। इस आपदा में कई लोगों की जान चली गई, और कुछ मृतकों के शव अब तक नहीं मिल पाए हैं। ऐसे में परिवारों के सामने अंतिम संस्कार का बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। जब मृत्यु की सूचना मिलती है, तो परिवार सूतक की प्रक्रिया में प्रवेश करता है और अंतिम संस्कार से जुड़े सभी धार्मिक कार्यों से दूरी बनाए रखता है।


प्रतीकात्मक अंतिम संस्कार का सहारा

इस कठिन परिस्थिति में, नेपाल के कुछ परिवार प्रतीकात्मक अंतिम संस्कार का सहारा ले रहे हैं। बागमती नदी के किनारे कुश घास से शव जैसी आकृति बनाई जा रही है, जिसका अंतिम संस्कार पशुपति आर्यघाट पर किया जा रहा है। पहली नजर में यह परंपरा अजीब लग सकती है, लेकिन हिंदू धार्मिक ग्रंथों में ऐसी परिस्थितियों के लिए प्रतीकात्मक दाह संस्कार का उल्लेख मिलता है।


कुश घास से प्रतीकात्मक शव बनाने की परंपरा

सनातन परंपरा में अंतिम संस्कार को 16 संस्कारों में से एक माना गया है। सामान्यतः मृतक के शरीर का विधिपूर्वक दाह किया जाता है। इसके बाद दशगात्र, पिंडदान और अन्य संस्कार किए जाते हैं। लेकिन जब किसी व्यक्ति की मृत्यु की सूचना मिल जाए और उसका शरीर न मिले, तब परंपरा के अनुसार प्रतीकात्मक अंतिम संस्कार करने का मार्ग बताया गया है। नेपाल में इसी परंपरा के अनुसार परिवार आगे बढ़ रहे हैं।


गरुड़ पुराण में उल्लेख

गरुड़ पुराण में ऐसी परिस्थितियों का उल्लेख मिलता है। अध्याय 10 के श्लोक 88 से 90 में कहा गया है कि यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु विदेश, जंगल या किसी ऐसी जगह हो जाए जहां उसका शव प्राप्त न हो सके, तो दर्भ यानी कुश घास से उसकी प्रतिकृति बनाकर दाह किया जा सकता है। इस तरह प्रतीकात्मक शव को मृतक के शरीर का प्रतिनिधि मानकर अंतिम संस्कार की प्रक्रिया पूरी की जाती है।


राख का विसर्जन

गरुड़ पुराण में प्रतीकात्मक दाह संस्कार के बाद की प्रक्रिया का भी उल्लेख है। कुश घास से बनाई गई प्रतिकृति का दाह करने के बाद उसकी राख को एकत्रित कर गंगा के जल में विसर्जित करने की बात कही गई है। इसके बाद दशगात्र आदि कर्म शुरू किए जाते हैं। वार्षिक श्राद्ध के लिए भी मृत्यु की सूचना मिलने वाले दिन को आधार माना जाता है। इसका मतलब यह है कि शव न मिलने पर भी संस्कारों की प्रक्रिया नहीं रुकती।


पौराणिक कथा का संदर्भ

पौराणिक कथाओं में राजा सगर के पुत्रों का प्रसंग भी इस विषय से जुड़ा है। मान्यता है कि महर्षि कपिल के शाप से राजा सगर के 60 हजार पुत्र जलकर भस्म हो गए थे। उनके शरीर नष्ट होने के कारण उनकी मुक्ति नहीं हो सकी। बाद में राजा भगीरथ गंगा को धरती पर लेकर आए। गंगा के स्पर्श से सगर पुत्रों की मुक्ति हुई। इसी कारण अंतिम संस्कार के बाद राख के पवित्र जल में विसर्जन को विशेष महत्व दिया जाता है।