मातृ नवमी श्राद्ध 2026: पितृपक्ष में माताओं को श्रद्धांजलि
मातृ नवमी श्राद्ध 2026: एक महत्वपूर्ण परंपरा
मातृ नवमी श्राद्ध 2026: हिंदू धर्म में पितृपक्ष के दौरान पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और आभार व्यक्त करने की एक पुरानी परंपरा है। हर पितर का श्राद्ध उनकी मृत्यु तिथि के अनुसार किया जाता है, अर्थात जिस दिन किसी पूर्वज ने इस संसार को छोड़ा था, उसी दिन उनका श्राद्ध संपन्न किया जाता है। इसी क्रम में आश्विन मास के कृष्णपक्ष की नवमी तिथि का विशेष महत्व है।
इस नवमी तिथि को मातृ नवमी कहा जाता है, जो खासतौर पर माताओं और परिवार की विवाहित महिलाओं के श्राद्ध के लिए सर्वोत्तम मानी जाती है। धर्माचार्यों के अनुसार, यह दिन मातृशक्ति के प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए समर्पित है, जिससे इसका महत्व और भी बढ़ जाता है।
सुहागिन स्त्री के श्राद्ध की विशेष परंपरा
धर्मशास्त्रों में इस तिथि को विशेष रूप से मृत सधवा स्त्री के लिए निर्धारित किया गया है। मान्यता है कि यदि किसी महिला का निधन पति के जीवित रहते होता है, तो मृत्यु के बाद भी उसकी गिनती सधवा स्त्रियों में होती है। जब उसके पति का भी देहांत हो जाता है, तब भी वह सधवा ही मानी जाती है। ऐसे में श्राद्धकर्ता, यानी पति के निधन के बाद, इस श्राद्ध को करने की जिम्मेदारी उसके पुत्र की होती है।
नियमों में परिवर्तन की परिस्थितियाँ
शास्त्रों में कुछ विशेष स्थितियों का उल्लेख किया गया है। यदि श्राद्धकर्ता पुत्र का स्वयं देहांत हो जाए, तो उसके बच्चों यानी पोते-पोतियों को पितामही का अविधवा नवमी श्राद्ध नहीं करना चाहिए। वहीं, यदि सौतेली मां जीवित हों और सगी मां का निधन हो चुका हो, तब भी पुत्र को यह श्राद्ध करना अनिवार्य बताया गया है। यह नियम परिवार की संरचना के अनुसार बदलते रहते हैं।
एक से अधिक माताओं के श्राद्ध का विधान
यदि किसी परिवार में एक से अधिक माताओं का निधन सधवा अवस्था में हुआ हो, तो उन सभी का श्राद्ध अविधवा नवमी के दिन एकतंत्रीय पद्धति से किया जाना चाहिए। ऐसी स्थिति में भोजन के लिए उतनी ही संख्या में सुहागिन महिलाओं को आमंत्रित करने की परंपरा है। यह भी स्पष्ट किया गया है कि पुत्र न होने की स्थिति में पुत्री या दामाद यह श्राद्ध नहीं कर सकते, यह अधिकार केवल पुत्र को ही प्राप्त है।