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मौनी अमावस्या: पितरों के प्रति श्रद्धा और तर्पण का महत्व

मौनी अमावस्या एक महत्वपूर्ण अवसर है, जब श्रद्धालु पितरों के प्रति आभार व्यक्त करते हैं। इस दिन तर्पण करने से पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है, जिससे जीवन में संतुलन और सकारात्मकता आती है। जानें इस दिन की धार्मिक मान्यता, तर्पण की विधि और इसके व्यापक प्रभाव के बारे में।
 

मौनी अमावस्या का महत्व


सनातन परंपरा के अनुसार, मौनी अमावस्या आत्मिक शुद्धि, संयम और पितरों के प्रति आभार व्यक्त करने का एक महत्वपूर्ण अवसर है। वर्ष 2026 में यह तिथि 18 जनवरी की रात 12:03 बजे से शुरू होकर 19 जनवरी की रात 1:21 बजे तक रहेगी। इस दौरान गंगा स्नान, मौन व्रत और पितृ तर्पण का विशेष महत्व है।


धार्मिक मान्यता

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन किया गया तर्पण पितरों तक शीघ्र पहुंचता है, जिससे जीवन में संतुलन और सकारात्मकता आती है। मौनी अमावस्या का संबंध मौन, संयम और आत्मचिंतन से है। शास्त्रों में अमावस्या तिथि को पितरों के लिए प्रिय माना गया है, इसलिए इस दिन तर्पण करना विशेष फलदायी समझा जाता है। तर्पण केवल जल अर्पण की क्रिया नहीं है, बल्कि यह अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और सम्मान व्यक्त करने का एक माध्यम है।


यह मान्यता है कि जब वंशज श्रद्धा भाव से पितरों का स्मरण करते हैं, तो उनकी आत्मा को शांति मिलती है और वे परिवार पर कृपा बनाए रखते हैं। विशेष रूप से गंगा या किसी पवित्र नदी के तट पर किया गया तर्पण अधिक प्रभावशाली माना जाता है।


पितृ दोष और तर्पण

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, पितृ दोष जीवन में आने वाली बाधाओं का एक कारण हो सकता है। जब पितरों को समय पर श्राद्ध, तर्पण या सम्मान नहीं मिलता, तो इसका प्रभाव व्यक्ति के मानसिक, पारिवारिक और आर्थिक जीवन पर पड़ सकता है। मौनी अमावस्या पर विधि-विधान से किया गया तर्पण पितृ दोष को शांत करने का एक प्रभावी उपाय माना जाता है। जल, तिल और कुश के माध्यम से किया गया तर्पण पितरों की असंतोष को कम करता है और धीरे-धीरे नकारात्मक प्रभाव समाप्त होने लगते हैं।


तर्पण का व्यापक प्रभाव

मौनी अमावस्या पर तर्पण का प्रभाव केवल व्यक्तिगत स्तर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे परिवार पर इसका सकारात्मक असर होता है। मान्यता है कि पितृ दोष के शांत होने से घर में सुख-शांति, स्वास्थ्य और आपसी सौहार्द बढ़ता है। संतान से जुड़े कष्ट, मानसिक तनाव और आर्थिक अड़चनें कम होने लगती हैं। आध्यात्मिक रूप से यह कर्म व्यक्ति को विनम्रता, संस्कार और अपने मूल से जुड़ने की प्रेरणा देता है।


तर्पण की विधि

तर्पण की विधि सरल लेकिन भावनात्मक रूप से गहन मानी गई है। प्रातः काल स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण कर शांत मन से कुश, तिल और जल द्वारा पितरों का स्मरण करते हुए तर्पण करना चाहिए। शास्त्रों में मौन रहकर यह कर्म करने की सलाह दी गई है, जिससे एकाग्रता और श्रद्धा बनी रहती है। तर्पण दिखावे के लिए नहीं, बल्कि सच्चे भाव और संयम के साथ किया जाए, तभी यह पूर्ण फल प्रदान करता है.


नोट

इस खबर में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं और सामान्य जानकारियों पर आधारित है। मीडिया चैनल इसकी पुष्टि नहीं करता है.