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लोहड़ी के गीत का रहस्य: दुल्ला भट्टी की अद्भुत कहानी

लोहड़ी का त्योहार केवल एक उत्सव नहीं है, बल्कि इसमें छिपी है दुल्ला भट्टी की अद्भुत कहानी। यह प्रसिद्ध गीत 'सुंदर मुंदरिये' एक मुस्लिम विद्रोही की प्रशंसा में है, जिसने अन्याय के खिलाफ संघर्ष किया। जानें कैसे दुल्ला भट्टी ने पंजाब की संस्कृति में एक महत्वपूर्ण स्थान बनाया और आज भी लोग उनके नाम का गुणगान करते हैं। इस लेख में हम लोहड़ी के गीत की गहराई में छिपी इस अद्भुत कहानी का अनावरण करेंगे।
 

लोहड़ी का उत्सव और संगीत


नई दिल्ली: लोहड़ी के अवसर पर जब आग जलती है, तो ढोल और ताशे की धुन से वातावरण गूंज उठता है। लोग भांगड़ा और गिद्दा नृत्य करते हैं और पारंपरिक पंजाबी लोक गीत गाते हैं। सदियों से, ये गीत पंजाब की संस्कृति, साहस और प्रतिरोध की कहानियों को पीढ़ी दर पीढ़ी संचारित करते आ रहे हैं। सबसे प्रसिद्ध लोहड़ी गीत की शुरुआत इन पंक्तियों से होती है, जिन्हें कई लोग याद करते हैं:


सुन्दर मुंदरिये
तेरा कौन विचारा
दुल्ला भट्टीवाला
दुल्ले दी धी व्याही
सेर शक्कर पायी
कुड़ी दा लाल पताका
कुड़ी दा सालू पाटा
सालू कौन समेटे...


हालांकि, बहुत से लोग इस गीत की असली और चौंकाने वाली कहानी से अनजान हैं। क्या आपको पता है कि यह प्रसिद्ध गीत, जो पंजाबी और सिख त्योहारों में गाया जाता है, वास्तव में एक मुस्लिम विद्रोही की प्रशंसा में है और इसकी जड़ें आज के पाकिस्तान में हैं? यह सच है, और इसकी कहानी खुद गाने से भी अधिक नाटकीय है।


दुल्ला भट्टी का परिचय

दुल्ला भट्टी कौन था?


दुल्ला भट्टी, जिनका पूरा नाम राय अब्दुल्ला दुल्ला भट्टी था, 16वीं सदी में मुगल सम्राट अकबर के शासनकाल में जीवित थे। उनकी कब्र आज भी पाकिस्तान के लाहौर में मियानी साहिब में स्थित है। ऐतिहासिक पंजाबी ग्रंथ और मौखिक परंपराएं उन्हें एक मुस्लिम राजपूत योद्धा के रूप में दर्शाती हैं, जिन्होंने मुगल शासन के खिलाफ विद्रोह किया। दुल्ला भट्टी को 'पंजाब का रॉबिन हुड' कहा जाता है। उन्होंने अन्याय के खिलाफ संघर्ष किया, अत्याचारी कर वसूलने वालों को लूटा, गरीबों की सहायता की और महिलाओं को जबरन विवाह से बचाया।


अकबर के खिलाफ विद्रोह का कारण

अकबर के खिलाफ विद्रोह क्यों किया?


यह संघर्ष अकबर की भूमि कर प्रणाली से शुरू हुआ, जिसे राजा टोडरमल ने तैयार किया था। इस नीति ने स्थानीय जमींदारों से भूमि राजस्व का नियंत्रण छीन लिया और सीधे मुगल अधिकारियों को सौंप दिया। हालांकि इससे साम्राज्य मजबूत हुआ, लेकिन पंजाब में अराजकता फैल गई। शक्तिशाली स्थानीय परिवारों ने अपना अधिकार खो दिया, जिसमें दुल्ला भट्टी का परिवार भी शामिल था।


दुल्ला के दादा बिजली भट्टी और पिता फरीद भट्टी ने इस प्रणाली के खिलाफ विद्रोह किया। दोनों को पकड़कर लाहौर लाया गया और सार्वजनिक रूप से फांसी दी गई। उनके सिर को डराने के लिए शहर के दरवाजों पर लटका दिया गया। दुल्ले की मां लाधी उस समय गर्भवती थीं, और दुल्ले का जन्म अपने पिता की मौत के चार महीने बाद हुआ।


अकबर के साथ संबंध

बादशाह अकबर के साथ एक अजीब रिश्ता


लोक इतिहासकारों के अनुसार, जिस दिन दुल्ले भट्टी का जन्म हुआ, उसी दिन अकबर के बेटे शेखू (बाद में बादशाह जहांगीर) का भी जन्म हुआ। ज्योतिषियों ने अकबर को सलाह दी कि उनके बेटे को बहादुर बनाने के लिए, उसे उसी दिन जन्म देने वाली एक राजपूत महिला का दूध पिलाया जाना चाहिए।


इतिहास के एक अजीब मोड़ में, अकबर द्वारा फांसी दिए गए एक व्यक्ति की पत्नी ने दुल्ले भट्टी और भविष्य के मुगल बादशाह दोनों को पाला। अकबर को उम्मीद थी कि शाही मेहरबानी लाधी के गुस्से को कम कर देगी और दुल्ले को विद्रोह करने से रोकेगी। लेकिन इतिहास ने कुछ और ही योजनाएं बनाई।


विद्रोही का उदय

एक विद्रोही का जन्म


जैसे-जैसे दुल्ले बड़ा हुआ, उसने धार्मिक गुरुओं से टकराव किया और औपचारिक शिक्षा को ठुकरा दिया। जब उसे अपने पिता और दादा की फांसी की पूरी सच्चाई पता चली, तो उसका मार्ग तय हो गया। उसने खुद को हथियारबंद किया और अपने अनुयायियों को इकट्ठा किया। उसकी लड़ाई केवल व्यक्तिगत बदला नहीं थी, बल्कि मुगल अत्याचार के खिलाफ तीन पीढ़ियों का संघर्ष बन गई।


लगभग 20 वर्षों तक, दुल्ले भट्टी ने मुगल प्रशासन को इतना परेशान किया कि लाहौर एक सैन्य शिविर में बदल गया। अंततः, उसे पकड़ लिया गया और दूसरों को विद्रोह से रोकने के लिए लाहौर के नखास बाजार में सार्वजनिक रूप से फांसी दी गई।


सुंदरी और मुंदरी की कहानी

सुंदरी और मुंदरी की कहानी


प्रसिद्ध लोहड़ी गीत एक लोकप्रिय पंजाबी लोक कथा से गहराई से जुड़ा हुआ है। एक गरीब ब्राह्मण की दो बेटियां थीं, सुंदरी और मुंदरी। एक शक्तिशाली जमींदार उनसे जबरदस्ती शादी करना चाहता था। दुल्ले भट्टी ने दखल दिया, लड़कियों को बचाया और उनकी शादी उनकी पसंद के लड़कों से करवा दी। लोक परंपरा में, वह उनका धर्मपिता बन गया। इस कार्य ने उसे सम्मान, न्याय और महिलाओं की सुरक्षा का प्रतीक बना दिया, और इसीलिए 'सुंदर मुंदरिये' गीत उसकी प्रशंसा में गाया जाता है।


दुल्ला भट्टी की विरासत

आज भी उनका नाम क्यों गाते हैं


दुल्ला भट्टी एक मुसलमान थे, जबकि लोहड़ी मुख्य रूप से सिख और हिंदू मनाते हैं। यह गीत भारत-पाकिस्तान सीमा के दोनों तरफ गाया जाता है, जो लोहड़ी को साझी संस्कृति और मिली-जुली विरासत का प्रतीक बनाता है। आज भी, जब बच्चे घर-घर जाकर 'सुंदर मुंदरिये' गाते हैं और मिठाई और पैसे लेते हैं, तो वे अनजाने में दुल्ला भट्टी की विरासत को फिर से जीवित करते हैं।


एक त्योहार से अधिक

सिर्फ एक त्योहार का गाना नहीं


लोहड़ी का गाना केवल संगीत नहीं है। यह विरोध, गौरव और सामाजिक न्याय की एक जीवित कहानी है। यह पंजाब को उस समय की याद दिलाता है जब लोग धर्म की परवाह किए बिना अन्याय के खिलाफ खड़े हुए थे। इसीलिए लोग कहते हैं, 'दुल्ला भट्टी मरे नहीं हैं। वह आज भी जिंदा हैं गानों, कहानियों और यादों में।'