सावन में विवाहित बेटियों का मायके आना: परंपरा और महत्व
सावन का महीना और पारिवारिक परंपराएं
नई दिल्ली: सावन का महीना भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा के लिए अत्यंत पवित्र माना जाता है। इस वर्ष श्रावण मास 30 जुलाई से शुरू होकर 28 अगस्त तक चलेगा। इस दौरान शिव मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना का आयोजन होगा और भक्त सावन सोमवार का व्रत रखेंगे। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सावन का संबंध केवल पूजा से नहीं, बल्कि पारिवारिक परंपराओं से भी है। इनमें से एक महत्वपूर्ण परंपरा विवाहित बेटियों का मायके आना है, जिसे शुभता, स्नेह और खुशहाली का प्रतीक माना जाता है।
मायके आने का महत्व
धार्मिक मान्यता के अनुसार, विवाह के बाद पहले सावन में बेटी का मायके आना विशेष रूप से शुभ माना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि इससे बेटी को मानसिक और भावनात्मक सुकून मिलता है, और परिवार के सदस्यों के बीच प्रेम और अपनापन बढ़ता है। कई परिवार आज भी इस परंपरा का पालन श्रद्धा के साथ करते हैं।
परिवार में सुख-समृद्धि का प्रतीक
यह मान्यता है कि जब विवाहित बेटी सावन में मायके आती है, तो उसके सौभाग्य का सकारात्मक प्रभाव पूरे परिवार पर पड़ता है। इससे घर में खुशहाली, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। यह परंपरा केवल नवविवाहित बेटियों तक सीमित नहीं है, बल्कि लंबे समय से विवाहित महिलाएं भी इसे निभा सकती हैं।
बेटी का स्वागत कैसे किया जाता है?
सावन में बेटी के मायके पहुंचने पर उसका पारंपरिक तरीके से स्वागत किया जाता है। दहलीज पर आरती उतारी जाती है, माथे पर रोली और अक्षत का तिलक लगाया जाता है। इसके बाद घेवर, मालपुआ, खीर जैसे पारंपरिक व्यंजनों से उसका मुंह मीठा कराया जाता है।
तुलसी का पौधा लगाने की मान्यता
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सावन में बेटी के हाथों घर के आंगन में तुलसी का पौधा लगवाना शुभ माना जाता है। इसके बाद उसे श्रृंगार सामग्री या उपहार भेंट किया जाता है, जिसे परिवार में मंगल और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।
सावन के सोमवार की तिथियां
साल 2026 में श्रावण मास 30 जुलाई से 28 अगस्त तक रहेगा। इस दौरान श्रद्धालुओं को भगवान शिव की आराधना के लिए चार सावन सोमवार मिलेंगे। शिव भक्त इन दिनों व्रत रखकर जलाभिषेक, रुद्राभिषेक और विशेष पूजा करते हैं, साथ ही सुख-समृद्धि और मनोकामना पूर्ति की प्रार्थना करते हैं।