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होलाष्टक: होली से पहले के आठ दिनों का महत्व और सावधानियाँ

होलाष्टक, होली से पहले के आठ दिनों का एक महत्वपूर्ण समय है, जिसे शुभ कार्यों के लिए उपयुक्त नहीं माना जाता। इस अवधि में संयम और साधना की आवश्यकता होती है। ज्योतिष के अनुसार, इन दिनों में ग्रहों की स्थिति मानसिक तनाव और अस्थिरता बढ़ा सकती है। भक्त प्रह्लाद की कथा से जुड़ी मान्यता के अनुसार, इन दिनों को परीक्षा और कष्ट का समय माना जाता है। जानें कि इस दौरान क्या करना चाहिए और क्या नहीं, ताकि आप इस समय का सही उपयोग कर सकें।
 

होलाष्टक का परिचय


होली का त्योहार रंगों और खुशियों का प्रतीक है, लेकिन इसके पहले आने वाले आठ दिन विशेष रूप से महत्वपूर्ण माने जाते हैं। इन दिनों को होलाष्टक कहा जाता है, और परंपरा के अनुसार, यह समय शुभ कार्यों के लिए उपयुक्त नहीं होता। वर्ष 2026 में होलाष्टक 25 फरवरी से शुरू होकर 3 मार्च तक चलेगा, जो होलिका दहन के दिन समाप्त होगा। इस अवधि में संयम, साधना और सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है।


होलाष्टक का अर्थ और महत्व

होलाष्टक नाम दो शब्दों 'होली' और 'अष्टक' से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है आठ दिन। यह अवधि फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से पूर्णिमा तक होती है। धार्मिक ग्रंथों और ज्योतिष के अनुसार, इस समय वातावरण में अशांति और अस्थिरता बढ़ सकती है। इसलिए विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन या नए व्यापार की शुरुआत जैसे मांगलिक कार्यों को टालने की सलाह दी जाती है।


ग्रहों की स्थिति और ज्योतिषीय मान्यता

ज्योतिष के अनुसार, होलाष्टक के दौरान आठ प्रमुख ग्रह अलग-अलग तिथियों पर प्रभाव डालते हैं। इन ग्रहों की स्थिति को उग्र माना जाता है, जिससे मानसिक तनाव या अस्थिरता बढ़ सकती है। जब ग्रह अनुकूल नहीं होते, तब नए कार्यों में बाधा आ सकती है। इसलिए इस समय धैर्य रखने और महत्वपूर्ण निर्णयों को टालने की सलाह दी जाती है। यह अवधि आत्मचिंतन और मन को शांत रखने के लिए उपयुक्त मानी जाती है।


भक्त प्रह्लाद की कथा

होलाष्टक को अशुभ मानने के पीछे एक पौराणिक कथा है। कहा जाता है कि असुर राजा हिरण्यकश्यप ने अपने पुत्र प्रह्लाद को भगवान विष्णु की भक्ति छोड़ने के लिए फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से पूर्णिमा तक अनेक कष्ट दिए। इन आठ दिनों में प्रह्लाद ने कई यातनाएं सहन कीं, लेकिन अपनी भक्ति नहीं छोड़ी। अंततः पूर्णिमा के दिन होलिका दहन हुआ और प्रह्लाद की रक्षा हुई। इसी कारण इन दिनों को कष्ट और परीक्षा का समय माना जाता है। पूर्णिमा के बाद का समय शुभ और मंगलकारी होता है।


होलाष्टक में क्या करें और क्या न करें

होलाष्टक के दौरान तामसिक भोजन और नशीले पदार्थों से दूर रहना चाहिए। क्रोध और जल्दबाजी से बचना आवश्यक है। यह समय पूजा, पाठ, मंत्र जाप और दान के लिए उपयुक्त माना जाता है। "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" का जाप करना या हनुमान चालीसा का पाठ करना मानसिक शांति प्रदान करता है। ध्यान और साधना से मन को मजबूत किया जा सकता है और नकारात्मकता को कम किया जा सकता है।