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होलिका दहन पर मान्यताएं: जानें किन्हें नहीं देखना चाहिए अग्नि

होलिका दहन का पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है, लेकिन इसके साथ कई पुरानी मान्यताएं जुड़ी हुई हैं। इस लेख में हम जानेंगे कि किन लोगों को इस अग्नि को देखने से मना किया जाता है और इसके पीछे के कारण क्या हैं। नई दुल्हन, सास-बहू, इकलौती संतान की मां, गर्भवती महिलाएं और नवजात शिशु जैसे विशेष व्यक्तियों के लिए यह परंपरा क्यों महत्वपूर्ण है। जानें इन मान्यताओं के पीछे की कहानियां और उनका महत्व।
 

होलिका दहन का महत्व

नई दिल्ली: होली का पर्व अच्छाई की विजय का प्रतीक है, लेकिन इसके पीछे कई प्राचीन परंपराएं और मान्यताएं छिपी हुई हैं। फाल्गुन पूर्णिमा को होलिका दहन किया जाता है, जिसमें लोग लकड़ी की चिता जलाकर बुराई का अंत करते हैं। इसके बाद अगले दिन रंगों से होली खेली जाती है। इस वर्ष 3 मार्च को होलिका दहन और 4 मार्च को धुलेंडी मनाई जाएगी। लेकिन क्या आप जानते हैं कि कुछ लोग इस अग्नि को देखने से बचते हैं?


पुरानी मान्यताएं

ये मान्यताएं सदियों से चली आ रही हैं, जो परिवार की खुशियों और स्वास्थ्य की रक्षा करती हैं। आज हम उन पांच विशेष व्यक्तियों के बारे में चर्चा करेंगे, जो होलिका दहन की लपटें नहीं देखते।


नई दुल्हन: मायके की ओर

शादी के बाद नई बहू को होलिका दहन से पहले मायके भेज दिया जाता है। वह कभी भी ससुराल में इस अग्नि का दर्शन नहीं करती। पौराणिक कथा के अनुसार, होलिका का विवाह इलोजी से तय था, लेकिन हिरण्यकश्यप के कहने पर वह प्रह्लाद के साथ अग्नि में बैठ गई और भस्म हो गई। बारात के आने पर इलोजी की मां ने चिता देखकर दुख से प्राण त्याग दिए। इसी कारण नई दुल्हन को इस दुखद घटना की याद से बचाने के लिए ऐसा किया जाता है, ताकि उसके वैवाहिक जीवन में कोई परेशानी न आए।


सास-बहू का साथ: रिश्तों में सामंजस्य

सास और बहू को एक साथ खड़े होकर होलिका दहन नहीं देखना चाहिए। मान्यता है कि ऐसा करने से घर में मतभेद बढ़ सकते हैं और रिश्ते बिगड़ सकते हैं। होलिका की कहानी में भी पारिवारिक कलह का उल्लेख है, इसलिए इस परंपरा का पालन सास-बहू के बीच तनाव को कम करने के लिए किया जाता है। कई परिवारों में यह नियम सख्ती से निभाया जाता है, ताकि त्योहार की खुशियां बनी रहें।


इकलौती संतान की मां: प्रह्लाद की याद में सावधानी

जिन माताओं की केवल एक संतान है, उन्हें होलिका दहन देखने से मना किया जाता है। प्रह्लाद हिरण्यकश्यप की इकलौती संतान थे, जिन्हें होलिका अग्नि में ले गई थी। इस कथा के आधार पर यह मान्यता बनी कि इकलौती संतान वाली मां को इस अग्नि से दूर रहना चाहिए, ताकि उनके बच्चे पर कोई विपत्ति न आए।


गर्भवती महिलाएं: स्वास्थ्य की प्राथमिकता

गर्भवती महिलाओं को होलिका दहन की अग्नि देखने या उसके चारों ओर घूमने से रोका जाता है। धुआं, गर्मी और भीड़ उनके लिए हानिकारक हो सकते हैं। पौराणिक रूप से भी इसे अशुभ माना जाता है। डॉक्टर भी सलाह देते हैं कि गर्भावस्था में ऐसे स्थानों से दूर रहना चाहिए, जहां धुआं या प्रदूषण अधिक हो।


नवजात शिशु: नकारात्मक ऊर्जा से सुरक्षा

नवजात बच्चों को होलिका दहन की जगह से पूरी तरह दूर रखा जाता है। मान्यता है कि चौराहों पर जलने वाली चिता के आसपास नकारात्मक ऊर्जा अधिक होती है, जो बच्चों के लिए ठीक नहीं है। स्वास्थ्य की दृष्टि से भी धुआं और ठंड बच्चों के लिए खतरनाक हो सकते हैं। इसलिए परिवार वाले बच्चों को घर में ही रखते हैं और त्योहार की खुशियां सुरक्षित तरीके से मनाते हैं।