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UPI लेन-देन पर नए शुल्क से उपभोक्ताओं में चिंता, सर्वे में चौंकाने वाले आंकड़े

डिजिटल इंडिया के युग में यूपीआई लेन-देन पर नए 0.4% शुल्क के लागू होने से उपभोक्ताओं में चिंता बढ़ गई है। एक हालिया सर्वे में 76% उपभोक्ताओं ने कहा है कि वे अतिरिक्त शुल्क नहीं देंगे और पुराने तरीकों की ओर लौट जाएंगे। व्यापारियों में भी इस नए नियम को लेकर असमंजस है, क्योंकि 41% व्यापारी खुद इस शुल्क को सहन नहीं करने के लिए तैयार हैं। वित्त मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि यह शुल्क उपभोक्ताओं पर नहीं डाला जा सकता, लेकिन नियमों के उल्लंघन पर कार्रवाई का कोई स्पष्ट तंत्र नहीं है।
 

डिजिटल लेन-देन में बदलाव की आहट

नई दिल्ली: डिजिटल इंडिया के युग में, सब्जी के ठेले से लेकर बड़े शॉपिंग मॉल तक, यूपीआई (UPI) स्कैन करना अब आम भारतीयों की दिनचर्या का हिस्सा बन चुका है। नकद पैसे रखने की आदत लगभग समाप्त हो चुकी है, लेकिन अब बड़े डिजिटल लेन-देन में एक महत्वपूर्ण बदलाव होने जा रहा है। 15 अक्टूबर 2026 से ₹2,000 से अधिक के पी2एम (P2M यानी पर्सन टू मर्चेंट) यूपीआई भुगतानों पर 0.4 प्रतिशत मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लागू होने की योजना है। इस निर्णय ने उपभोक्ताओं और व्यापारियों दोनों के बीच चिंता की लहर पैदा कर दी है। हाल ही में एक सर्वे में यह सामने आया है कि यदि ग्राहकों की जेब से एक भी अतिरिक्त पैसा कटता है, तो वे यूपीआई का उपयोग छोड़कर पुराने तरीकों की ओर लौट जाएंगे।


सर्वे में उपभोक्ताओं की प्रतिक्रिया

76% ग्राहक एक्स्ट्रा चार्ज देने को तैयार नहीं
कम्युनिटी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'लोकलसर्किल्स' ने देश के 291 जिलों में 67,000 से अधिक यूपीआई उपयोगकर्ताओं के बीच एक सर्वे किया। इसके परिणामों के अनुसार, 76 प्रतिशत उपभोक्ताओं ने स्पष्ट रूप से कहा है कि वे ₹2,000 से ऊपर के भुगतान पर किसी भी अतिरिक्त शुल्क का भुगतान नहीं करेंगे। यदि उन पर यह चार्ज लगाया गया, तो वे तुरंत भुगतान का तरीका बदल देंगे। केवल 14 प्रतिशत उपयोगकर्ता ऐसे मिले जो अतिरिक्त शुल्क कटने के बावजूद यूपीआई का उपयोग जारी रखने के पक्ष में थे, जबकि बाकी सभी ने वैकल्पिक तरीकों पर जाने का मन बना लिया है।


कैश का दौर लौट सकता है

कैश का दौर लौटेगा, क्रेडिट और डेबिट कार्ड बनेंगे बैकअप
यदि बड़े यूपीआई भुगतानों पर शुल्क लगाया गया, तो भारतीय बाजार फिर से नकद की ओर मुड़ सकता है। सर्वे के आंकड़ों के अनुसार, 27 प्रतिशत लोग डिजिटल लेन-देन बंद कर वापस नकद में भुगतान करने का निर्णय लेंगे। वहीं 26 प्रतिशत उपभोक्ता क्रेडिट कार्ड और 14 प्रतिशत डेबिट कार्ड के जरिए स्वाइप करने का विकल्प चुनेंगे। इसके अलावा, 4 प्रतिशत उपयोगकर्ताओं ने पारंपरिक बैंक ट्रांसफर जैसे एनईएफटी या आईएमपीएस का उपयोग करने की बात कही है, जबकि 9 प्रतिशत ने अन्य निशुल्क तरीकों की ओर रुख करने का संकेत दिया है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि 2 प्रतिशत लोगों ने कहा कि यदि अतिरिक्त शुल्क लगाया गया, तो वे अपनी खरीदारी ही टाल देंगे।


व्यापारियों की चिंता

दुकानदारों में भारी असमंजस
यह चिंता केवल ग्राहकों तक सीमित नहीं है, बल्कि छोटे और बड़े व्यापारी भी तनाव में हैं। नियम के अनुसार, 0.4 प्रतिशत एमडीआर लागू होने पर यदि कोई ग्राहक ₹5,000 का सामान खरीदता है, तो दुकानदार के खाते से ₹20 कट जाएंगे। वहीं ₹50,000 के बड़े बिल पर दुकानदार को सीधे ₹200 का नुकसान उठाना पड़ेगा। लोकलसर्किल्स द्वारा 32,000 से अधिक व्यापारियों से बातचीत में 41 प्रतिशत कारोबारियों ने कहा कि वे अपनी जेब से कोई एमडीआर नहीं भरेंगे। केवल 17 प्रतिशत दुकानदार ही इस खर्च को खुद उठाने के लिए सहमत दिखे, जबकि 9 प्रतिशत व्यापारियों ने बताया कि वे पहले से ही यूपीआई स्वीकार नहीं करते हैं।


वित्त मंत्रालय की स्थिति

वित्त मंत्रालय की स्पष्टता
इस पूरे विवाद के बीच वित्त मंत्रालय ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा है कि एमडीआर न तो सरकार का कोई टैक्स है और न ही इसे एनपीसीआई अपने लिए वसूल रहा है। केंद्र सरकार ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि मर्चेंट डिस्काउंट रेट का बोझ किसी भी स्थिति में आम उपभोक्ताओं पर नहीं डाला जा सकता और बैंक यह सुनिश्चित करें कि ग्राहकों से कोई अतिरिक्त राशि न काटी जाए। 15 अक्टूबर से इस व्यवस्था की निगरानी की जाएगी।

हालांकि, रिपोर्ट में इस बात को लेकर गंभीर चिंता जताई गई है कि यदि कोई दुकानदार बिल में एमडीआर जोड़कर चोरी-छिपे ग्राहक से पैसे वसूलता है, तो उस पर क्या दंडात्मक कार्रवाई होगी और पीड़ित ग्राहक को उसका पैसा कैसे वापस मिलेगा, इसका कोई स्पष्ट तंत्र अभी सामने नहीं आया है। बाजार के जानकारों का मानना है कि यदि इस भ्रम को समय रहते दूर नहीं किया गया, तो बड़े यूपीआई लेन-देन का एक बड़ा हिस्सा फिर से नकद अर्थव्यवस्था में बदल सकता है।