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धर्म फॉर लाइफ हिन्दी साहित्य का उद्घाटन: साहित्य और समाज के बीच संवाद

गुरूग्राम में ट्यूलिप फाउंडेशन की इकाई 'धर्म फॉर लाइफ' ने 'धर्म फॉर लाइफ हिन्दी साहित्य' का उद्घाटन किया। इस अवसर पर आयोजित साहित्यिक परिचर्चा में वरिष्ठ साहित्यकारों ने साहित्य के सामाजिक और नैतिक पहलुओं पर विचार साझा किए। कार्यक्रम में साहित्य को केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि समाज में सकारात्मक परिवर्तन का माध्यम बताया गया। वरिष्ठ लेखकों ने साहित्य की भूमिका को उजागर करते हुए इसे मानवता और करुणा का प्रतीक माना। इस पहल का उद्देश्य साहित्य, संस्कृति और मानवीय मूल्यों को समाज के केंद्र में लाना है।
 

गाजियाबाद में साहित्यिक परिचर्चा का आयोजन

सुशील कुमार शर्मा


गाजियाबाद: गुरूग्राम में ट्यूलिप फाउंडेशन की शाखा “धर्म फॉर लाइफ” ने “धर्म फॉर लाइफ हिन्दी साहित्य” का उद्घाटन करते हुए एक महत्वपूर्ण साहित्यिक चर्चा का आयोजन किया। इस कार्यक्रम का मुख्य विषय था — “साहित्य : धर्म का मर्म, चेतना और परिवर्तन”। इस अवसर पर साहित्य, संस्कृति और सामाजिक चेतना के विभिन्न पहलुओं पर गहन संवाद हुआ।


इस आयोजन में कई वरिष्ठ साहित्यकार, चिंतक और साहित्य प्रेमी उपस्थित थे, जिन्होंने कार्यक्रम को विशेष महत्व दिया। वक्ताओं ने साहित्य को केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि समाज में संवेदना, नैतिकता और सकारात्मक बदलाव का आधार बताया। वरिष्ठ साहित्यकार लक्ष्मी शंकर वाजपेयी ने कहा कि धर्म का असली स्वरूप मानवता, करुणा और नैतिक चेतना में छिपा है, और साहित्य इन्हीं मूल्यों को जीवित रखने का माध्यम है। प्रसिद्ध लेखक नरेंद्र नागदेव ने साहित्य को समाज का दस्तावेज बताते हुए कहा कि यह समय की पीड़ा, संघर्ष और आशाओं को व्यक्त करता है।



वरिष्ठ लेखिका वंदना यादव ने स्त्री चेतना और साहित्य के संबंधों पर अपने विचार साझा करते हुए कहा कि साहित्य उन पहलुओं को उजागर करता है जिन्हें अक्सर मुख्यधारा में नजरअंदाज किया जाता है। वहीं, पॉडकास्टर और लेखिका पारुल सिंह ने भारतीय साहित्य को सांस्कृतिक निरंतरता और लोकमंगल की परंपरा से जोड़ा। पूरे संवाद का संचालन डॉ. मेधावी जैन (संस्थापिका, धर्म फॉर लाइफ) ने प्रभावशाली तरीके से किया, जिससे विषय की गंभीरता बनी रही। कार्यक्रम की योजना और आयोजन में साहित्यकार किरण यादव की महत्वपूर्ण भूमिका रही, जिन्होंने बताया कि “धर्म फॉर लाइफ हिन्दी साहित्य” का उद्देश्य साहित्य, संस्कृति और मानवीय मूल्यों को समाज के केंद्र में लाना है।



कार्यक्रम के समापन पर रीता जैन (अध्यक्षा, अभिव्यक्ति) ने इस पहल को साहित्य और समाज के बीच संवाद स्थापित करने वाला महत्वपूर्ण प्रयास बताया। मंच संचालन विशाल पाण्डेय ने प्रभावशाली ढंग से किया। इस अवसर पर देवेन्द्र बहल (संस्थापक, सभ्या प्रकाशन) और अशोक गुप्ता (संस्थापक अद्विक पब्लिकेशन) की उपस्थिति भी उल्लेखनीय रही। आयोजन के दौरान बार-बार यह विचार उभरकर सामने आया कि साहित्य केवल शब्दों का संसार नहीं, बल्कि समाज में संवेदना, संवाद और सकारात्मक परिवर्तन का माध्यम है। “धर्म फॉर लाइफ हिन्दी साहित्य” की यह पहल भविष्य में साहित्यिक और वैचारिक चेतना को नई दिशा देने की महत्वपूर्ण शुरुआत मानी जा रही है।