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भारत में आर्थिक विषमता का बढ़ता संकट: आयकर रिटर्न्स का विश्लेषण

भारत में आर्थिक विषमता की स्थिति चिंताजनक होती जा रही है, जैसा कि हाल के आयकर रिटर्न्स के आंकड़ों से स्पष्ट होता है। पांच लाख रुपये तक की आय वाले व्यक्तियों के रिटर्न की संख्या में गिरावट आई है, जबकि उच्च आय वर्ग के लोगों की संख्या बढ़ रही है। हवाई यात्रा के आंकड़े भी इस विषमता को दर्शाते हैं। जानें इस विषय पर और क्या कहती हैं रिपोर्टें और आंकड़े।
 

आर्थिक विषमता की नई तस्वीर


आयकर रिटर्न्स से स्पष्ट होता है कि भारत में प्रत्यक्ष कर राजस्व अब अधिकतर धनी वर्गों पर निर्भर हो रहा है। हाल ही में हवाई यात्रा से जुड़े आंकड़े भी इस विषमता को दर्शाते हैं।


वित्त वर्ष 2025-26 के लिए दाखिल किए गए आयकर रिटर्न्स ने देश में बढ़ती आर्थिक असमानता की एक झलक पेश की है। एक वित्तीय समाचार पत्र के विश्लेषण के अनुसार, पांच लाख रुपये तक की आय वाले व्यक्तियों के रिटर्न की संख्या 2024-25 की तुलना में लगभग आधी रह गई है। यह संभवतः इस कारण हुआ कि पिछले वित्त वर्ष में सरकार द्वारा आयकर दरों में वृद्धि के चलते कई लोगों के लिए रिटर्न दाखिल करना अनिवार्य नहीं रह गया। लेकिन यह भी दर्शाता है कि लोग अब उच्च आय वर्ग में शामिल होने की प्रक्रिया में बाधा का सामना कर रहे हैं।


2019-20 से 2022-25 के बीच, पांच लाख रुपये से कम आय वाले वर्ग से सबसे अधिक रिटर्न दाखिल किए जाते थे। लेकिन अब पांच से दस लाख रुपये की आय वाले समूह ने यह स्थान ले लिया है। 2024-25 में इस आय वर्ग में चार करोड़ 75 लाख रिटर्न दाखिल हुए, जो पिछले वर्ष पांच करोड़ 45 लाख तक पहुंच गए। यह स्पष्ट है कि भारत में प्रत्यक्ष कर राजस्व अब धनी वर्गों पर अधिक निर्भर हो रहा है।


हवाई यात्रा के आंकड़े भी इस विषमता को उजागर करते हैं। 2011-12 में हर दस लाख जनसंख्या पर 649 परिवारों के 775 लोगों ने हवाई यात्रा की थी, जबकि 2023-24 में यह संख्या 15 करोड़ 37 लाख तक पहुंच गई। लेकिन अब हर दस लाख जनसंख्या में केवल 471 लोगों ने यात्रा की, जो 469 परिवारों से आए। इसका मतलब यह है कि 2011 में हवाई यात्राओं की संख्या भले ही कम थी, लेकिन जनसंख्या के अनुपात में यात्रियों की संख्या अधिक थी। महंगी कारों और अन्य उपभोक्ता वस्तुओं की खरीदारी के आंकड़े भी इसी रुझान को दर्शाते हैं। इसलिए, सरकार के विषमता कम करने के दावों पर विश्वास करना कठिन हो गया है। उदाहरण के लिए, पारिवारिक उपभोग खर्च सर्वे रिपोर्ट- 2023-24 में ऐसा दावा किया गया है, जबकि आय और व्यय के अन्य आंकड़े कुछ और कहानी बयां करते हैं।