आरबीआई की FCNR योजना: क्या फिर से मिलेगा 'लीवरेज' का लाभ?
मुंबई में बैंकिंग क्षेत्र में हलचल
मुंबई: भारतीय रिजर्व बैंक ने 'फॉरेन करेंसी नॉन-रेसिडेंट' (FCNR) डिपॉजिट योजना को पुनर्जीवित करने का निर्णय लिया है, जिससे बैंकिंग क्षेत्र में हलचल मच गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस योजना के माध्यम से प्रवासी भारतीयों, यानी एनआरआई, के जरिए भारत में अरबों डॉलर का निवेश हो सकता है। लेकिन इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि क्या आरबीआई निवेशकों को 'लीवरेज' का लाभ देगा, जैसा कि 2013 में हुआ था।
आरबीआई का नया कदम
आरबीआई ने नए FCNR डिपॉजिट पर 'हेजिंग कॉस्ट' का बोझ खुद उठाने का निर्णय लिया है, जो आमतौर पर बैंकों के लिए 3% से 3.5% तक होता है। इस कदम से बैंक प्रवासी भारतीयों को अधिक ब्याज दर प्रदान कर सकेंगे। वर्तमान में FCNR डिपॉजिट पर 3.5% से 4% का रिटर्न मिलता है, लेकिन आरबीआई की सहायता के बाद यह बढ़कर 6% से 6.5% तक पहुंच सकता है। हालांकि, कुछ बैंकर्स का मानना है कि केवल ब्याज दर में वृद्धि से विदेशी निवेश में बड़ा बदलाव नहीं आएगा।
लीवरेज का महत्व
असली खेल है 'लीवरेज' का
2013 में इस योजना का असली गेम चेंजर 'लीवरेज' था। उस समय, अमीर प्रवासियों ने विदेशी बैंकों से उधार लेकर अपने निवेश को बढ़ाया। भारतीय बैंकों ने 'स्टैंडबाय लेटर्स ऑफ क्रेडिट' प्रदान कर विदेशी कर्जदाताओं का जोखिम कम किया, जिससे लोन प्राप्त करना आसान हो गया। इस प्रक्रिया के माध्यम से निवेशकों ने अपनी पूंजी से कई गुना बड़ा FCNR डिपॉजिट तैयार किया। उदाहरण के लिए, यदि किसी NRI ने 1 लाख डॉलर का निवेश किया, तो उसने उधार के पैसे मिलाकर 10 लाख डॉलर का डिपॉजिट बना लिया।
बदलते हालात
2013 और आज के माहौल में जमीन-आसमान का अंतर है
ब्याज दरों में कमी के कारण 2013 में भारत के सरकारी बॉंड पर 9% से अधिक रिटर्न था, जबकि अमेरिकी बॉंड पर यह 1% से भी कम था। आज यह अंतर घटकर केवल 2.4% रह गया है, जिससे पुराना तरीका अब उतना लाभकारी नहीं रहा।
अमेरिका में उच्च ब्याज दरें भी इस स्थिति को प्रभावित कर रही हैं। यदि अमेरिका में ब्याज दरें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं, तो बिना उधार के डॉलर को भारत में जमा करने का आकर्षण कम हो जाएगा।
विशेषज्ञों की राय
2013 का वो जादुई आंकड़ा
इन बदलते हालातों के कारण विशेषज्ञों का मानना है कि इस योजना की सफलता के लिए 'लीवरेज' का होना आवश्यक है। 2013 में इसी उधारी के माध्यम से बैंकों ने FCNR डिपॉजिट के जरिए लगभग 26 अरब डॉलर और विदेशी कर्ज के माध्यम से 8 अरब डॉलर जुटाए थे, जिससे कुल 34 अरब डॉलर भारत में आए थे। इसमें एचडीएफसी बैंक, आईसीआईसीआई बैंक और एसबीआई जैसे प्रमुख बैंकों ने महत्वपूर्ण योगदान दिया था।
अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या आरबीआई इस बार 'लीवरेज' की अनुमति देता है। यदि अनुमति मिलती है, तो अमीर प्रवासियों का बड़ा निवेश भारत में आएगा, अन्यथा यह योजना एक सामान्य निवेश विकल्प बनकर रह जाएगी।