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आरबीआई ने दो सप्ताह में बेचा 1.14 लाख करोड़ का सोना, अर्थव्यवस्था पर असर

हाल ही में आई ब्लूमबर्ग इकोनॉमिक्स की रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि आरबीआई ने दो सप्ताह में 1.14 लाख करोड़ रुपये का सोना बेचा है। यह कदम भारतीय अर्थव्यवस्था पर पश्चिम एशिया के तनाव के प्रभाव को दर्शाता है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि आरबीआई ने विदेशी मुद्रा भंडार को स्थिर रखने के लिए यह कदम उठाया है। हालांकि, आरबीआई ने इस पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है। जानें इस रिपोर्ट में और क्या जानकारी है और इसका अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ सकता है।
 

भारतीय अर्थव्यवस्था पर ब्लूमबर्ग इकोनॉमिक्स की रिपोर्ट के खुलासे


भारतीय अर्थव्यवस्था पर आई ब्लूमबर्ग इकोनॉमिक्स की रिपोर्ट में हुए चौकाने वाले खुलासे


पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने का प्रभाव अब भारतीय अर्थव्यवस्था पर स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। जबकि केंद्र सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) इस स्थिति को नकारते रहे हैं, ब्लूमबर्ग इकोनॉमिक्स की हालिया रिपोर्ट में कुछ चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि पश्चिम एशिया की स्थिति का भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।


इस रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि आरबीआई ने विदेशी मुद्रा भंडार को स्थिर रखने और रुपये पर दबाव कम करने के लिए अपने सोने के भंडार का एक हिस्सा बेचा है। रिपोर्ट के अनुसार, 22 मई को समाप्त हुए दो सप्ताह में आरबीआई ने लगभग 12 अरब डॉलर (लगभग 1.14 लाख करोड़ रुपये) मूल्य का सोना बेचा। इस दौरान केंद्रीय बैंक ने लगभग 7.5 अरब डॉलर (713.23 अरब रुपये) की विदेशी मुद्रा संपत्तियां भी जोड़ीं।


आरबीआई की प्रतिक्रिया का इंतजार

हालांकि, इस रिपोर्ट में किए गए खुलासों पर आरबीआई की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। बताया गया है कि आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा रुपये को मजबूत करने के लिए विभिन्न विकल्पों पर विचार कर रहे हैं, जिसमें ब्याज दरों में बदलाव और विदेशी निवेशकों से अधिक डॉलर निवेश आकर्षित करने के उपाय शामिल हो सकते हैं। लेकिन आरबीआई ने अब तक सोने की बिक्री के संबंध में किसी भी दावे की पुष्टि नहीं की है, इसलिए इसे ब्लूमबर्ग इकोनॉमिक्स के विश्लेषण पर आधारित अनुमान माना जा रहा है।


फिर भी, यह रिपोर्ट दर्शाती है कि वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव के बीच भारत अपने विदेशी मुद्रा भंडार और रुपये की स्थिरता बनाए रखने के लिए सक्रिय कदम उठा रहा है। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें भी सरकार के लिए चिंता का विषय बनी हुई हैं। भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चे तेल का आयातक है, और पश्चिम एशिया में संघर्ष के कारण तेल की कीमतों में वृद्धि से भारत पर अतिरिक्त आर्थिक दबाव पड़ रहा है।


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