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आरबीआई ने विदेशी मुद्रा नियमों में बदलाव का प्रस्ताव रखा

भारतीय रिजर्व बैंक ने बैंकों की विदेशी मुद्रा स्थिति को नियंत्रित करने वाले नियमों में बदलाव का प्रस्ताव दिया है। इस बदलाव का उद्देश्य बैंकों की विदेशी मुद्रा संपत्तियों और देनदारियों के बीच के अंतर को बेहतर तरीके से प्रबंधित करना है। नए दिशानिर्देश बासेल समिति के मानकों के अनुरूप हैं और सभी विनियमित संस्थाओं में समान रूप से लागू होंगे। जानें इस प्रस्ताव के पीछे के कारण और इसके संभावित प्रभावों के बारे में।
 

आरबीआई का नया प्रस्ताव

भारतीय रिजर्व बैंक ने बुधवार को बैंकों की विदेशी मुद्रा स्थिति को नियंत्रित करने वाले नियमों में संशोधन का सुझाव दिया है। एक आधिकारिक बयान में बताया गया कि मौजूदा दिशा-निर्देशों की गहन समीक्षा के बाद नेट ओपन पोजिशन (एनओपी) के नियमों में बदलाव किए गए हैं।


नेट ओपन पोजिशन (एनओपी) का महत्व

नेट ओपन पोजिशन का अर्थ है बैंकों की कुल विदेशी मुद्रा संपत्तियों और देनदारियों के बीच का अंतर, जो मुद्रा के उतार-चढ़ाव या विनिमय दर के जोखिम को दर्शाता है। आरबीआई ने बताया कि नए दिशानिर्देश बैंकिंग पर्यवेक्षण पर बासेल समिति (बीसीबीएस) के मानकों के साथ अधिक मेल खाते हैं।


संशोधनों की मुख्य बातें

आरबीआई ने यह भी स्पष्ट किया कि वह सभी विनियमित संस्थाओं में इन संशोधनों का समान रूप से कार्यान्वयन सुनिश्चित करेगा। प्रस्तावित संशोधनों में ऑफशोर और ऑनशोर के लिए अलग-अलग एनओपी गणना को समाप्त करना और विदेशी लेनदेन से प्राप्त अधिशेष को एनओपी में शामिल करना शामिल है। इसके अलावा, वास्तविक एनओपी पर विदेशी मुद्रा जोखिम पूंजी शुल्क बनाए रखने और एनओपी की गणना के लिए शॉर्टहैंड पद्धति में बदलाव का भी प्रस्ताव दिया गया है।