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कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि का महंगाई पर सीमित प्रभाव: वित्त मंत्री

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने हाल ही में कहा कि वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि का भारत में महंगाई पर कोई महत्वपूर्ण प्रभाव नहीं पड़ेगा। उन्होंने बताया कि देश में मुद्रास्फीति पहले से ही अपने निचले स्तर पर है। इसके अलावा, उन्होंने कच्चे तेल की कीमतों में हालिया वृद्धि के कारणों और इसके संभावित प्रभावों पर भी चर्चा की। जानें इस विषय पर और क्या कहा गया है।
 

महंगाई पर कच्चे तेल की कीमतों का प्रभाव

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने सोमवार को बताया कि वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का महंगाई पर कोई खास असर नहीं पड़ेगा, क्योंकि देश में मुद्रास्फीति पहले से ही अपने न्यूनतम स्तर के करीब है।


सीतारमण ने लोकसभा में एक लिखित प्रश्न के उत्तर में कहा कि पिछले एक वर्ष में वैश्विक कच्चे तेल और भारतीय बास्केट की कीमतों में लगातार गिरावट आई है।


28 फरवरी, 2026 को पश्चिम एशिया में संघर्ष शुरू होने के बाद से कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आई है। उन्होंने कहा, 'फरवरी के अंत से दो मार्च, 2026 तक भारतीय बास्केट में कच्चे तेल की कीमत 69.01 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 80.16 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल हो गई है। चूंकि भारत में मुद्रास्फीति अपने निचले स्तर पर है, इसलिए इसका प्रभाव महत्वपूर्ण नहीं माना जा रहा है।'


वित्त मंत्री ने यह भी बताया कि अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान पर सैन्य हमले के बाद से वैश्विक कच्चे तेल की कीमतें बढ़ी हैं। ईरान ने इस हमले के जवाब में क्षेत्र में अमेरिकी ठिकानों और इजराइल पर भी हमले किए हैं।


इस संदर्भ में, मंत्री ने कहा कि भारतीय रिजर्व बैंक की अक्टूबर 2025 की मौद्रिक नीति रिपोर्ट में यह अनुमान लगाया गया था कि यदि कच्चे तेल की कीमतें आधारभूत अनुमानों से 10 प्रतिशत अधिक होती हैं, तो घरेलू कीमतों पर इसका पूरा प्रभाव पड़ने पर मुद्रास्फीति 0.3 प्रतिशत तक बढ़ सकती है।


हालांकि, कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि का महंगाई पर मध्यम अवधि का प्रभाव कई कारकों पर निर्भर करता है, जैसे विनिमय दर में उतार-चढ़ाव, वैश्विक मांग और आपूर्ति की स्थिति, मौद्रिक नीति का लाभ ग्राहकों तक पहुंचाना, सामान्य मुद्रास्फीति की स्थिति और अप्रत्यक्ष प्रभाव की सीमा।


उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित औसत खुदरा मुद्रास्फीति 2025-26 (अप्रैल-जनवरी) में घटकर 1.8 प्रतिशत पर रही, जबकि 2024-25 में यह 4.6 प्रतिशत और 2023-24 में 5.4 प्रतिशत थी।