क्या डॉलर का वर्चस्व खत्म होगा? ब्रिक्स देशों की नई रणनीति
नई दिल्ली में वैश्विक आर्थिक बदलाव
नई दिल्ली: अमेरिकी डॉलर, जो दशकों से वैश्विक अर्थव्यवस्था पर हावी रहा है, अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चुनौतियों का सामना कर रहा है। पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गए कड़े प्रतिबंध, भू-राजनीतिक तनाव और वैश्विक गुटबाजी के बीच, प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाएं पश्चिमी वित्तीय निर्भरता को कम करने के लिए सक्रिय हो गई हैं। इस दिशा में, चीन और रूस 'डी-डॉलराइजेशन' या डॉलर-मुक्त व्यापार की पहल कर रहे हैं। भारत का दृष्टिकोण इस संदर्भ में संतुलित और व्यावहारिक है, जो एकल मुद्रा के बजाय बहुध्रुवीय अंतरराष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था का समर्थन करता है।
ब्रिक्स का आर्थिक ढांचा
ब्रिक्स समूह, जो वैश्विक अर्थव्यवस्था के एक-तिहाई हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है, अब डॉलर के प्रभुत्व को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। इसका मुख्य उद्देश्य सदस्य देशों के बीच व्यापार को रुपये, युआन और रियल जैसी स्थानीय मुद्राओं में करना है। ब्रिक्स बैंक भी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए डॉलर के बजाय स्थानीय मुद्राओं में ऋण देने को प्राथमिकता दे रहा है। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय व्यापार में डॉलर की हिस्सेदारी अभी भी 85 प्रतिशत से अधिक है।
अमेरिका की चिंताएं
अमेरिकी रणनीतिकारों के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि चीन दुनिया का सबसे बड़ा मैन्युफैक्चरिंग हब है। यदि चीन अपने विशाल आपूर्ति नेटवर्क के बदले युआन में भुगतान अनिवार्य कर देता है, तो यह अंतरराष्ट्रीय मौद्रिक संतुलन में बड़ा बदलाव ला सकता है। इसके साथ ही, चीन अपनी डिजिटल करेंसी को वैश्विक व्यापार के लिए अनुकूल बना रहा है। यदि अन्य देश डॉलर में लेन-देन कम करते हैं, तो वाशिंगटन की आर्थिक नीतियों पर असर पड़ेगा। भारत और रूस के बीच तेल व्यापार इसका एक उदाहरण है, जहां भारत ने बड़े पैमाने पर कच्चा तेल खरीदा है।
रूस-चीन की साझेदारी से डॉलर का हाशियाकरण
यूक्रेन युद्ध के बाद, जब पश्चिमी देशों ने रूस को SWIFT बैंकिंग नेटवर्क से बाहर किया, तब मॉस्को और बीजिंग ने अपने द्विपक्षीय लेन-देन में डॉलर और यूरो को लगभग पूरी तरह से हटा दिया। वर्तमान में, दोनों देशों के बीच 90 प्रतिशत से अधिक व्यापार स्थानीय मुद्राओं, जैसे चीनी युआन और रूसी रूबल में हो रहा है। इसमें युआन की हिस्सेदारी लगभग 70 प्रतिशत है। अमेरिका के SWIFT भुगतान तंत्र का विकल्प निकालने के लिए, चीन ने अपनी अंतर-बैंकिंग प्रणाली (CIPS) और रूस ने (SPFS) विकसित की है। इसके तहत, रूस से चीन जाने वाले कच्चे तेल, प्राकृतिक गैस और कोयले का भुगतान पश्चिमी बैंकों की भूमिका के बिना किया जा रहा है। रूस के केंद्रीय बैंक के विदेशी मुद्रा भंडार में अब डॉलर के स्थान पर युआन का वर्चस्व है।