टाटा संस और ट्रस्ट्स के बीच बढ़ता विवाद: रिजर्व बैंक की प्रक्रिया पर सवाल
टाटा समूह में उठे नए सवाल
टाटा संस के नियामक दर्जे को लेकर भारतीय रिजर्व बैंक के साथ चल रही लंबी प्रक्रिया ने टाटा समूह के भीतर नई चिंताओं को जन्म दिया है। टाटा ट्रस्ट्स के सदस्यों का मानना है कि क्या रिजर्व बैंक के साथ हुई बातचीत, प्रस्तुत किए गए उत्तर और विभिन्न विकल्पों पर चर्चा की जानकारी ट्रस्ट्स को पूरी तरह से दी गई थी।
टाटा ट्रस्ट्स की चिंताएं
सूत्रों के अनुसार, टाटा ट्रस्ट्स से जुड़े व्यक्तियों का कहना है कि उन्हें रिजर्व बैंक को दी गई दलीलों और सुनवाई की प्रक्रिया के बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं मिली। टाटा ट्रस्ट्स के पास टाटा संस की लगभग 66 प्रतिशत हिस्सेदारी है, जिससे यह सवाल उठता है कि कंपनी ने रिजर्व बैंक के समक्ष क्या बातें रखीं और किन विकल्पों पर चर्चा की।
रिजर्व बैंक का निर्णय
टाटा संस और टाटा ट्रस्ट्स ने इस मामले में पूछे गए सवालों का कोई जवाब नहीं दिया है। यह मामला टाटा संस के उस प्रयास से संबंधित है, जिसमें कंपनी ने अपनी मुख्य निवेश कंपनी के रूप में पंजीकरण समाप्त करने की मांग की थी। यदि ऐसा होता, तो कंपनी को शेयर बाजार में लिस्टेड होने की आवश्यकता से राहत मिल सकती थी।
रिजर्व बैंक की श्रेणी
सितंबर 2022 में, रिजर्व बैंक ने टाटा संस को ऊपरी स्तर की गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी के रूप में वर्गीकृत किया था। इस श्रेणी में आने वाली कंपनियों के लिए शेयर बाजार में लिस्टेड होना अनिवार्य है। टाटा संस ने बाद में मुख्य निवेश कंपनी के रूप में पंजीकरण समाप्त करने का प्रयास किया, ताकि वह निजी बनी रह सके।
निदेशक मंडल के निर्णय
हालांकि, 11 सितंबर 2026 को रिजर्व बैंक ने टाटा संस के आवेदन को अस्वीकार कर दिया और कंपनी को नियमों का पालन करने के लिए आवश्यक कदम उठाने को कहा। इसके बाद, 17 सितंबर को टाटा संस के निदेशक मंडल ने शेयर बाजार में लिस्टेड होने की दिशा में आगे बढ़ने का निर्णय लिया। इसी बैठक में एन. चंद्रशेखरन को कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में पांच साल का एक और कार्यकाल देने का भी निर्णय लिया गया।
टाटा ट्रस्ट्स की आपत्ति
टाटा ट्रस्ट्स ने कहा है कि उसने टाटा संस के लिस्टेड होने पर सहमति नहीं दी थी और रिजर्व बैंक के निर्णय के बाद सभी विकल्पों पर विचार किया जाना चाहिए था। ट्रस्ट्स ने कंपनी की पुरानी संचालन व्यवस्था को बनाए रखने की बात भी कही है।
निदेशक मंडल में मतभेद
इससे निदेशक मंडल में मतभेद भी स्पष्ट हो गए हैं। नोएल टाटा ने चंद्रशेखरन के कार्यकाल बढ़ाने के निर्णय का विरोध किया, जबकि निदेशक वेणु श्रीनिवासन ने इसका समर्थन किया। लिस्टेड होने के मुद्दे पर भी वेणु श्रीनिवासन के रुख को लेकर सवाल उठाए गए हैं।
भविष्य की चुनौतियाँ
अब विवाद केवल रिजर्व बैंक के पंजीकरण को ठुकराने तक सीमित नहीं है। बड़ा सवाल यह है कि इस प्रक्रिया में कौन-कौन से विकल्प तलाशे गए और टाटा ट्रस्ट्स को कब और कितनी जानकारी दी गई। टाटा संस को अब रिजर्व बैंक के निर्देशों के अनुसार लिस्टेड होने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना होगा और साथ ही ट्रस्ट्स के साथ मतभेद भी सुलझाने होंगे।