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टाटा समूह में विवाद: खंबाटा ने ट्रस्ट से इस्तीफा दिया

टाटा समूह के भीतर चल रहे विवाद ने अब उसके प्रमुख ट्रस्टों को भी प्रभावित किया है। वरिष्ठ वकील डेरियस खंबाटा ने ट्रस्ट में पुनर्नियुक्ति से इनकार कर दिया है, जिससे टाटा संस के भविष्य पर सवाल उठने लगे हैं। खंबाटा ने भारतीय रिजर्व बैंक के साथ बातचीत के परिणामों पर असंतोष व्यक्त किया है और ट्रस्ट के भीतर मतभेदों का भी जिक्र किया है। इस लेख में जानें कि कैसे ये घटनाएँ टाटा समूह की रणनीति और शेयर बाजार में लिस्टेड होने की संभावनाओं को प्रभावित कर सकती हैं।
 

टाटा ट्रस्ट्स में खींचतान का नया मोड़

टाटा समूह के भीतर चल रहे विवाद ने अब उसके प्रमुख ट्रस्टों को भी प्रभावित किया है। वरिष्ठ वकील डेरियस खंबाटा ने सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट और सर रतन टाटा ट्रस्ट के ट्रस्टी के रूप में पुनर्नियुक्ति से इनकार कर दिया है। उन्होंने टाटा ट्रस्ट्स के अध्यक्ष नोएल टाटा को एक पत्र भेजकर स्पष्ट किया है कि वह अब इन संस्थाओं में अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाना चाहते। उनका कार्यकाल 9 नवंबर को समाप्त हो रहा है, और उनके इस निर्णय ने टाटा संस के भविष्य और उसके शेयर बाजार में लिस्टेड होने के मुद्दे को फिर से चर्चा में ला दिया है.


आरबीआई के साथ बातचीत पर असंतोष

खंबाटा ने अपने पत्र में भारतीय रिजर्व बैंक के साथ हुई बातचीत के परिणामों पर भी असंतोष व्यक्त किया है। उनका कहना है कि अगस्त और सितंबर में हुई महत्वपूर्ण घटनाओं के बाद, टाटा ट्रस्ट्स ने रिजर्व बैंक के सामने कई विकल्प प्रस्तुत किए थे, लेकिन कोई ठोस समाधान नहीं निकला। ट्रस्ट यह साबित नहीं कर सके कि टाटा संस बिना शेयर बाजार में लिस्टेड हुए भी पारदर्शिता और जानकारी सार्वजनिक करने के नियमों का पालन कैसे कर सकती है.


टाटा संस की नियामकीय स्थिति

खंबाटा के अनुसार, टाटा संस को या तो अपनी कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी की पहचान छोड़नी थी या फिर अपने व्यवसाय का ढांचा बदलना था। उन्होंने 17 सितंबर को टाटा संस की बोर्ड बैठक को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा कि उस दिन कंपनी के अध्यक्ष एन चंद्रशेखरन को 5 साल का सेवा विस्तार देने और कंपनी को शेयर बाजार में लिस्टेड करने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का निर्णय लिया गया था.


ट्रस्ट के भीतर मतभेद

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, खंबाटा के इस निर्णय के पीछे एक कारण यह भी हो सकता है कि 9 नवंबर को पुनर्नियुक्ति के प्रस्ताव पर उन्हें समर्थन नहीं मिले। ट्रस्ट के भीतर पहले से ही मतभेद हैं। उपाध्यक्ष विजय सिंह और वेणु श्रीनिवासन, नोएल टाटा के कुछ प्रस्तावों का विरोध कर रहे हैं। वहीं, नोएल टाटा, नेविल टाटा और भास्कर भट्ट समेत चार न्यासियों ने कंपनी के पुनर्गठन की योजना का समर्थन किया था.


टाटा संस का भविष्य

इस विवाद की जड़ टाटा संस की नियामकीय स्थिति है। भारतीय रिजर्व बैंक ने सितंबर में टाटा संस की कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी के रूप में अपना पंजीकरण छोड़ने की अर्जी खारिज कर दी थी। इसके बाद कंपनी के शेयर बाजार में लिस्टेड होने की संभावना बढ़ गई। टाटा संस का बोर्ड पंजीकरण छोड़कर कंपनी को निजी और गैर-लिस्टेड बनाए रखना चाहता था.


पुनर्गठन की योजना

टाटा संस के पुनर्गठन का प्रस्ताव सामने आया था, जिसमें टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स सिस्टम्स सॉल्यूशंस और टाटा कंसल्टिंग इंजीनियर्स का टाटा संस के साथ विलय करने की योजना थी। इससे कंपनी केवल निवेश रखने वाली संस्था के बजाय निवेश और कारोबार दोनों संभालने वाली कंपनी बन सकती थी. हालांकि, इस योजना ने ट्रस्ट के भीतर विवाद को और बढ़ा दिया.


निवेशकों की नजरें

खंबाटा ने नवंबर 2025 में ट्रस्ट के भीतर किसी कब्जे या सत्ता पलट की कोशिश से जुड़ी अटकलों को खारिज किया था। उन्होंने नोएल टाटा को अध्यक्ष बनाए जाने का समर्थन किया था और टाटा संस को लिस्टेड करने के खिलाफ थे। उनका मौजूदा निर्णय यह दर्शाता है कि कंपनी को गैर-लिस्टेड रखने के लिए व्यावहारिक और नियामकीय रूप से स्वीकार्य रास्ता खोजना कितना कठिन हो रहा है. अब नोएल टाटा के सामने ट्रस्ट के भीतर सहमति बनाने और टाटा संस के भविष्य पर निर्णय लेने की चुनौती बढ़ गई है.