दवा निर्माण में रसायनों की निगरानी को लेकर नए नियम लागू
दवाओं की गुणवत्ता में सुधार के लिए नए दिशा-निर्देश
केंद्र सरकार ने दवाओं की गुणवत्ता और मरीजों की सुरक्षा को बढ़ाने के लिए दवा निर्माण में उपयोग होने वाले महत्वपूर्ण रसायनों की निगरानी को सख्त कर दिया है। अब, इन रसायनों की हर खेप को बाजार में भेजने से पहले डिजिटल पंजीकरण और अनापत्ति प्रमाणपत्र प्राप्त करना अनिवार्य होगा। हालांकि, इस नए नियम को लेकर दवा कंपनियों में कई सवाल उठ रहे हैं, विशेषकर उन कंपनियों के लिए जो निर्यात के लिए दवाएं बनाती हैं। उद्योग के विशेषज्ञों को चिंता है कि यदि मंजूरी में देरी हुई, तो दवाओं की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है।
सीडीएससीओ के निर्देश और उद्योग की चिंताएं
केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ) ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के औषधि नियंत्रकों को निर्देशित किया है कि दवा उपयोग में आने वाले रसायनों के सभी निर्माताओं और आपूर्तिकर्ताओं को ऑनलाइन राष्ट्रीय औषधि लाइसेंस प्रणाली पर पंजीकरण कराना होगा। इसके साथ ही, हर खेप को वितरित करने से पहले अनापत्ति प्रमाणपत्र लेना आवश्यक होगा। इस व्यवस्था का उद्देश्य दवाओं में उपयोग होने वाले कच्चे माल की खरीद और आपूर्ति पर निगरानी रखना है।
निर्यात कंपनियों पर नियमों का प्रभाव
हालांकि, दवा उद्योग के अधिकारियों का कहना है कि जारी निर्देशों में घरेलू और निर्यात के लिए दवाओं में उपयोग होने वाले रसायनों के बीच कोई स्पष्ट भेद नहीं किया गया है। इससे निर्यात के लिए दवाएं बनाने वाली कंपनियां भी इस नियम के दायरे में आ सकती हैं। एक दवा उद्योग अधिकारी ने बताया कि सरकार को इस विषय में स्पष्ट जानकारी देनी चाहिए ताकि विभिन्न राज्यों में नियमों को लेकर भिन्नता न हो।
नए नियमों के कार्यान्वयन की चुनौतियां
इस नई व्यवस्था को लागू करने की क्षमता को लेकर भी चिंताएं व्यक्त की जा रही हैं। कई राज्यों के औषधि नियंत्रण विभागों में पहले से ही कर्मचारियों की कमी है, जिससे हर खेप के लिए प्रमाणपत्र जारी करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। उद्योग के विशेषज्ञों का मानना है कि मंजूरी में देरी से छोटी दवा कंपनियों को अधिक परेशानी हो सकती है, क्योंकि उनके पास भंडार कम होता है और वे स्थानीय आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भर होती हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में दवाओं की उपलब्धता पर प्रभाव
इसका असर ग्रामीण क्षेत्रों में दवाओं की उपलब्धता पर भी पड़ सकता है। उद्योग के अनुमानों के अनुसार, भारत में खांसी और जुकाम की दवाओं का बाजार लगभग 7,000 करोड़ रुपये का है। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र और राजस्थान के ग्रामीण इलाकों में इन दवाओं की मांग अधिक है। यदि छोटी कंपनियों को मंजूरी में देरी होती है, तो इसका असर छोटे शहरों और गांवों की दवा दुकानों पर पड़ सकता है।
नए नियमों के साथ समय सीमा की आवश्यकता
एकम्स ड्रग्स की निदेशक अरुषि जैन ने कहा कि गुणवत्ता से संबंधित नए नियमों के साथ मंजूरी देने की समय सीमा भी निर्धारित की जानी चाहिए। नियामक विभागों, आपूर्तिकर्ताओं और दवा निर्माताओं के बीच बेहतर तालमेल आवश्यक है, ताकि दवाओं की उपलब्धता पर कोई नकारात्मक प्रभाव न पड़े।
सख्त निगरानी का उद्देश्य
यह कदम मध्य प्रदेश में 2025 में कोल्ड्रिफ खांसी सिरप से 24 बच्चों की मौत के बाद उठाए गए सख्त निगरानी के हिस्से के रूप में लिया गया है। जांच में सिरप में जहरीले रसायन डायएथिलीन ग्लाइकोल की अधिक मात्रा पाई गई थी। यह एक सस्ता औद्योगिक रसायन है, जिसका गलत या गैरकानूनी उपयोग दवाओं में प्रोपाइलीन ग्लाइकोल के स्थान पर किया जा सकता है।
नई निगरानी व्यवस्था में शामिल रसायन
नई निगरानी व्यवस्था में ग्लिसरीन, प्रोपाइलीन ग्लाइकोल, सोर्बिटोल, माल्टिटोल, पॉलीइथिलीन ग्लाइकोल, पॉलीसॉर्बेट और एथिल अल्कोहल जैसे रसायन शामिल हैं। इनका उपयोग सिरप, गोलियां, कैप्सूल, मलहम और इंजेक्शन सहित विभिन्न प्रकार की दवाओं के निर्माण में किया जाता है। इस प्रकार, सरकार को दवाओं की गुणवत्ता पर कड़ी नजर रखने के साथ-साथ उनकी नियमित आपूर्ति बनाए रखने की चुनौती का सामना करना होगा।