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नीति आयोग के सदस्य ने सुधारों में विनियमन कम करने की आवश्यकता पर जोर दिया

नीति आयोग के सदस्य राजीव गौबा ने हाल ही में एक सम्मेलन में सुधारों में विनियमन को कम करने और नियमों को सरल बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने आर्थिक सुधारों के प्रभाव, भरोसे पर आधारित शासन, और डिजिटल अवसंरचना के महत्व पर भी चर्चा की। गौबा ने कहा कि सरकार ने निवेशकों के भरोसे को मजबूत करने के लिए कई कदम उठाए हैं। इस लेख में गौबा के विचारों और सुधारों की दिशा में उठाए गए कदमों का विस्तृत विवरण दिया गया है।
 

विनियमन में कमी की आवश्यकता

नीति आयोग के सदस्य राजीव गौबा ने बृहस्पतिवार को अगली पीढ़ी के सुधारों में विनियमन को कम करने और नियमों को सरल बनाने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने ग्लोबल फिनटेक सम्मेलन में कहा कि सुधारों के अगले चरण में जमीनी स्तर पर बुनियादी सुधारों पर ध्यान केंद्रित करना आवश्यक है। गौबा ने विभिन्न प्रकार के लाइसेंस, मंजूरी, अनुमति और बार-बार नवीनीकरण की प्रक्रिया को समाप्त करने की आवश्यकता पर जोर दिया।


आर्थिक सुधारों का प्रभाव

गौबा ने बताया कि माल एवं सेवा कर, दिवाला एवं ऋणशोधन अक्षमता संहिता और उदारीकृत विदेशी निवेश जैसे उपायों ने अर्थव्यवस्था को नया दिशा दी है। इन सुधारों के माध्यम से रक्षा, अंतरिक्ष और परमाणु ऊर्जा जैसे क्षेत्रों को निजी उद्यमों के लिए खोला गया है, जो पहले लगभग बंद थे। उन्होंने विभिन्न कानूनों और प्रशासनिक प्रक्रियाओं की समीक्षा की आवश्यकता पर भी जोर दिया।


भरोसे पर आधारित शासन

गौबा ने कहा कि यह कार्य प्रधानमंत्री की भरोसे पर आधारित शासन की सोच के अनुरूप एक उच्चस्तरीय समिति द्वारा किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि कई महत्वपूर्ण सुधार राज्यों और नगर निकायों के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। उन्होंने विनियमन कम करने के लिए गठित कार्यबल द्वारा किए जा रहे प्रयासों का भी उल्लेख किया।


केंद्र सरकार की योजनाएं

राज्यों के लिए पूंजी निवेश के विशेष सहायता योजनाओं और शहरी चुनौती कोष का जिक्र करते हुए, गौबा ने केंद्र सरकार के दृष्टिकोण को ‘प्रतिस्पर्धी बढ़त वाला सहकारी संघवाद’ बताया। इन योजनाओं में प्रोत्साहन को सुधार के लक्ष्यों से जोड़ा गया है और परियोजनाओं का चयन चुनौती आधारित प्रक्रिया के माध्यम से किया जाता है।


डिजिटल अवसंरचना का महत्व

गौबा ने भारत की डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना जैसे आधार, यूपीआई, डिजिलॉकर और खाता ‘एग्रीगेटर’ व्यवस्था को दुनिया के लिए अनुकरणीय मॉडल बताया। उन्होंने कहा कि प्रौद्योगिकी आधारित क्षेत्रों में विनियमन ऐसा होना चाहिए जो जनहित की रक्षा और नवोन्मेष को बढ़ावा देने के बीच संतुलन बनाए।


नियामकीय रूपरेखा

गौबा ने कहा कि नियामकीय रूपरेखा सिद्धांत आधारित, प्रौद्योगिकी-निरपेक्ष और जोखिम के अनुरूप होनी चाहिए। इसमें प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देने, बुनियादी अवसंरचना तक भेदभाव रहित पहुंच सुनिश्चित करने और सूचना की असमानता कम करने पर भी जोर होना चाहिए।


सरकार के प्रयास

गौबा ने वित्तीय नियामकों के बीच बेहतर समन्वय, अनुपालन प्रक्रियाओं को सरल बनाने और प्रक्रियागत अड़चनों को दूर करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि सरकार ने घरेलू और विदेशी दीर्घकालिक पूंजी को आकर्षित करने के लिए निवेशकों के भरोसे को मजबूत करने के लिए कई कदम उठाए हैं।


दीर्घकालिक सोच की आवश्यकता

गौबा ने कहा कि सुधार राजकाज की संस्कृति का अभिन्न हिस्सा होना चाहिए और इसके लिए दीर्घकालिक तथा रणनीतिक सोच की आवश्यकता है।