बजट 2026: यूपीआई के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण चुनौतियाँ
यूपीआई का महत्व और चुनौतियाँ
नई दिल्ली: 1 फरवरी को प्रस्तुत होने वाला केंद्रीय बजट 2026 डिजिटल इंडिया के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यूपीआई ने देश में भुगतान की प्रक्रिया को बदल दिया है, लेकिन इसके पीछे की छिपी लागत अब चिंता का विषय बन गई है।
शून्य एमडीआर नीति, घटते सरकारी प्रोत्साहन और बढ़ते लेनदेन के बोझ ने बैंकों और फिनटेक कंपनियों पर दबाव बढ़ा दिया है। ऐसे में सरकार के सामने यह सवाल है कि यूपीआई को कैसे सुरक्षित और टिकाऊ बनाया जाए।
यूपीआई की सफलता और छिपी समस्याएँ
चाय की दुकानों से लेकर महंगे स्मार्टफोन्स की खरीद तक, यूपीआई अब हर लेनदेन का हिस्सा बन चुका है। नोटबंदी और कोरोना महामारी के बाद डिजिटल भुगतान में तेजी आई है। हालांकि, इस तेजी के साथ सिस्टम पर खर्च भी बढ़ता गया है। हर लेनदेन को प्रोसेस करने में लागत आती है, जिसे वर्तमान में बैंक और फिनटेक कंपनियाँ खुद उठाती हैं। यही कारण है कि इस मॉडल की स्थिरता पर सवाल उठ रहे हैं।
व्यापारी विस्तार की कमी
यूपीआई के तेजी से बढ़ते उपयोग के बावजूद, व्यापारी विस्तार अपेक्षित स्तर पर नहीं पहुंचा है। आंकड़ों के अनुसार, पिछले तीन वर्षों में सक्रिय व्यापारी क्यूआर नेटवर्क की वृद्धि धीमी रही है। आज भी देश के केवल लगभग 45 प्रतिशत व्यापारी नियमित रूप से यूपीआई स्वीकार करते हैं। कई पिनकोड ऐसे हैं, जहां सक्रिय यूपीआई व्यापारियों की संख्या बहुत कम है, जो सिस्टम पर बढ़ते दबाव को दर्शाता है।
फिनटेक सेक्टर पर बढ़ता बोझ
सरकार की शून्य एमडीआर नीति ने डिजिटल भुगतान को आम जनता तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। लेकिन अब यह नीति फिनटेक सेक्टर के लिए एक बोझ बनती जा रही है। आरबीआई के अनुसार, हर यूपीआई लेनदेन पर औसतन 2 रुपये का खर्च आता है, जिसे सेवा प्रदाताओं को उठाना पड़ता है। उद्योग का मानना है कि बिना किसी ठोस राजस्व मॉडल के यह स्थिति लंबे समय तक नहीं चल सकती।
घटते इंसेंटिव और बढ़ती चिंताएँ
यूपीआई को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने प्रारंभिक वर्षों में प्रोत्साहन दिए, लेकिन हाल के समय में यह सहायता लगातार घटती गई है। जहां पहले हजारों करोड़ रुपये का इंसेंटिव दिया गया, वहीं अब यह राशि काफी कम हो चुकी है। PhonePe जैसे बड़े प्लेटफॉर्म का कहना है कि मौजूदा समर्थन तकनीकी ढांचे, सुरक्षा और नए उपयोगकर्ताओं को जोड़ने के लिए अपर्याप्त है। इससे नवाचार और विस्तार की गति धीमी पड़ सकती है।
आरबीआई की चेतावनी
आरबीआई गवर्नर पहले ही संकेत दे चुके हैं कि यूपीआई हमेशा मुफ्त नहीं रह सकता। उनका कहना है कि किसी न किसी को सिस्टम की लागत उठानी होगी। भारतीय भुगतान परिषद ने भी चेतावनी दी है कि बिना स्थायी आय मॉडल के कंपनियों के लिए निवेश जारी रखना मुश्किल होगा। उद्योग नियंत्रित एमडीआर या बेहतर सब्सिडी की मांग कर रहा है।
बजट 2026 से उम्मीदें
फिनटेक कंपनियों और विशेषज्ञों की नजरें अब बजट 2026 पर टिकी हैं। उनका मानना है कि यदि सरकार ने इस बार ठोस समाधान नहीं दिया, तो यूपीआई की विकास यात्रा प्रभावित हो सकती है। एक संतुलित मॉडल, जिसमें उपभोक्ताओं पर बोझ न पड़े और सिस्टम भी आत्मनिर्भर बने, समय की सबसे बड़ी आवश्यकता बन चुकी है।