बैंक ऑफ बड़ौदा और एनएमसी हेल्थ के बीच समझौता: 60 करोड़ डॉलर का भुगतान
बैंक ऑफ बड़ौदा ने एनएमसी हेल्थ के प्रशासकों के साथ 60 करोड़ डॉलर का समझौता किया है, जिससे लंबित कानूनी कार्यवाही समाप्त होगी। इस समझौते का उद्देश्य दिवालियापन प्रक्रिया को आगे बढ़ाना है। एनएमसी हेल्थ के संस्थापक डॉ. बी. आर. शेट्टी के खिलाफ कई दावे किए गए थे। जानें इस समझौते के वित्तीय प्रभाव और बैंक के तिमाही आंकड़ों के बारे में।
Jul 2, 2026, 20:36 IST
बैंक ऑफ बड़ौदा का एनएमसी हेल्थ के साथ समझौता
बैंक ऑफ बड़ौदा ने स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र की प्रमुख कंपनी एनएमसी हेल्थ के प्रशासकों के साथ एक अदालत के बाहर समझौता किया है। इस समझौते के अनुसार, बैंक लगभग 60 करोड़ अमेरिकी डॉलर, जो कि लगभग 5,700 करोड़ रुपये के बराबर है, का भुगतान करेगा। इस निर्णय के साथ ही संयुक्त अरब अमीरात के अबू धाबी ग्लोबल मार्केट और ब्रिटेन की अदालतों में चल रही कानूनी कार्यवाही समाप्त करने की प्रक्रिया भी शुरू हो गई है।
समझौते की शर्तें
इस समझौते में दोनों पक्षों ने किसी भी प्रकार की कानूनी जिम्मेदारी या दोष स्वीकार नहीं किया है। इसका मुख्य उद्देश्य लंबे समय से चल रहे मुकदमों को समाप्त करना और दिवालियापन प्रक्रिया को आगे बढ़ाना है।
एनएमसी हेल्थ का इतिहास
एनएमसी हेल्थ की स्थापना भारतीय व्यवसायी डॉ. बी. आर. शेट्टी ने की थी। 2020 में कंपनी के अचानक पतन ने वैश्विक वित्तीय जगत को चौंका दिया था। बाद में की गई फोरेंसिक जांच में कंपनी पर अरबों डॉलर के ऐसे कर्ज का खुलासा हुआ, जिसकी पहले जानकारी नहीं थी। जांच में कई वित्तीय अनियमितताओं के आरोप भी सामने आए थे। अनुमान है कि कंपनी पर 5 से 6 अरब अमेरिकी डॉलर तक का छिपा हुआ कर्ज था।
कानूनी कार्रवाई और दावे
कंपनी के दिवालिया होने के बाद विभिन्न देशों में कानूनी कार्रवाई शुरू हुई। एनएमसी हेल्थ के प्रशासकों ने लेनदारों का पैसा वापस दिलाने के लिए कई व्यक्तियों और संस्थाओं के खिलाफ दावे किए, जिनमें कंपनी के संस्थापक डॉ. बी. आर. शेट्टी, कुछ पूर्व वरिष्ठ अधिकारी और बैंक ऑफ बड़ौदा शामिल थे।
बैंक का रुख
प्रशासकों का आरोप था कि बैंक और कंपनी के बीच कुछ वित्तीय व्यवस्थाओं के कारण कर्ज की वास्तविक स्थिति छिपी रही। हालांकि, बैंक ने इन आरोपों को स्वीकार नहीं किया और अब दोनों पक्षों ने विवाद समाप्त करने के लिए समझौते का रास्ता चुना है।
समझौते का वित्तीय प्रभाव
समझौते के तहत बैंक द्वारा दी जाने वाली राशि एनएमसी हेल्थ की दिवालिया संपत्ति में जमा होगी। इसके बाद यह धन दिवालियापन कानूनों के अनुसार विभिन्न लेनदारों, बैंकों, बॉंड धारकों और व्यापारिक लेनदारों के बीच प्राथमिकता के आधार पर वितरित किया जाएगा।
विशेषज्ञों की राय
विशेषज्ञों का कहना है कि पहली नजर में यह असामान्य लग सकता है कि एक ऋण देने वाला बैंक दिवालिया कंपनी की संपत्ति में भुगतान कर रहा है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय दिवालियापन मामलों में ऐसा कई बार होता है, जब प्रशासक तीसरे पक्ष पर कथित वित्तीय भूमिका को लेकर दावा करते हैं और लंबी कानूनी लड़ाई से बचने के लिए समझौता किया जाता है।
बैंक के कारोबारी आंकड़े
इस बीच, बैंक ऑफ बड़ौदा ने अपनी पहली तिमाही के कारोबारी आंकड़े भी जारी किए हैं। बैंक के अनुसार, घरेलू जमा राशि में 14.7 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जो अब 14.2 लाख करोड़ रुपये हो गई है। वहीं, घरेलू ऋण वितरण 16.1 प्रतिशत बढ़कर 11.5 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है।
निवेशकों की प्रतिक्रिया
समझौते की घोषणा के बाद निवेशकों की प्रतिक्रिया भी देखने को मिली। बैंक के शेयरों में लगभग 4 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि निवेशक इस भुगतान के वित्तीय असर और लेखांकन प्रक्रिया को लेकर स्पष्टता का इंतजार कर रहे हैं। हालांकि, बैंक की मजबूत पूंजी स्थिति और बड़े आकार को देखते हुए इसे एक बार का वित्तीय प्रभाव माना जा रहा है, जिससे बैंक की दीर्घकालिक स्थिरता पर कोई बड़ा खतरा नहीं है।