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भारत का कच्चे तेल का आयात अक्टूबर में रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा

भारत का कच्चे तेल का आयात अक्टूबर में रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है, जो लगभग 56 लाख बैरल प्रतिदिन है। इस वृद्धि के पीछे भू-राजनीतिक तनाव और तेल की आवाजाही में सुधार जैसे कारक हैं। जानें कि कैसे रूस और पश्चिम एशिया से तेल की खरीद में बदलाव आ रहा है और इसका भारतीय बाजार पर क्या प्रभाव पड़ रहा है।
 

कच्चे तेल का आयात बढ़ा

नई दिल्ली, 1 नवंबर: भारत का कच्चे तेल का आयात अक्टूबर में लगभग 56 लाख बैरल प्रतिदिन के ऐतिहासिक स्तर पर पहुंच गया है। ऊर्जा क्षेत्र की डेटा कंपनी केप्लर के अनुसार, भारतीय रिफाइनरियों ने भू-राजनीतिक तनाव के बावजूद पश्चिम एशिया और रूस से कच्चे तेल की खरीद में वृद्धि की है। केप्लर के प्रमुख विश्लेषक निखिल दुबे ने बताया कि अक्टूबर में भारत को पश्चिम एशिया से लगभग 23 लाख बैरल प्रतिदिन कच्चे तेल की आपूर्ति मिली, जबकि रूस से आयात लगभग 20 लाख बैरल प्रतिदिन बना रहा।


तेल की आवाजाही में सुधार

दुबे ने कहा कि शिप-टू-शिप ट्रांसफर में वृद्धि के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य के माध्यम से कच्चे तेल की आवाजाही में सुधार हुआ है। इससे सितंबर और अक्टूबर के दौरान खाड़ी देशों से आपूर्ति में वृद्धि हुई और भारतीय रिफाइनरियों को तेल खरीदने के लिए अधिक विकल्प मिले। हालांकि, नवंबर और दिसंबर में रूस से तेल की आपूर्ति में कमी आने की संभावना है।


रूसी तेल की लागत में वृद्धि

काला सागर क्षेत्र में हमलों के कारण माल ढुलाई की लागत में वृद्धि हो रही है, जिससे रूसी कच्चा तेल भारतीय खरीदारों के लिए महंगा हो सकता है। दूसरी ओर, खाड़ी देशों के आपूर्तिकर्ता भारतीय बाजार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए प्रतिस्पर्धी कीमतों पर तेल उपलब्ध करा रहे हैं। दुबे के अनुसार, यदि होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल की आपूर्ति में फिर से बाधा आती है, तो भारतीय रिफाइनरियां अधिक परिवहन लागत के बावजूद रूसी तेल की खरीद को फिर से बढ़ा सकती हैं।


खरीद में लचीलापन

उन्होंने यह भी बताया कि 16 अक्टूबर को ग्राहम अधिनियम के तहत मिली छूट से कुछ भारतीय खरीदारों की रूसी तेल खरीद से जुड़े जोखिमों को लेकर चिंताएं कम हो सकती हैं। इससे रिफाइनरियों को खरीद संबंधी निर्णय लेने में अधिक लचीलापन मिलेगा। भारत अपनी कच्चे तेल की कुल जरूरत का लगभग 90 प्रतिशत आयात करता है।


भू-राजनीतिक और व्यावसायिक पहलू

इसलिए, वैकल्पिक स्रोतों से तेल की उपलब्धता और उसकी वास्तविक लागत देश के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। यही कारण है कि रूस और पश्चिम एशिया के बीच तेल खरीद का निर्णय केवल भू-राजनीतिक परिस्थितियों पर निर्भर नहीं है, बल्कि कीमत, परिवहन खर्च और आपूर्ति की सुरक्षा जैसे व्यावसायिक पहलुओं से भी प्रभावित होता है। उल्लेखनीय है कि फरवरी 2022 में यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद वैश्विक तेल व्यापार का स्वरूप बदल गया।


रूस पर प्रतिबंध

पश्चिमी देशों ने रूस पर कई प्रतिबंध लगाए हैं। यूरोपीय संघ ने समुद्री मार्ग से रूसी कच्चे तेल के आयात पर प्रतिबंध लगाया, जबकि जी-7 देशों ने रूसी तेल पर मूल्य सीमा लागू की। यूरोपीय खरीदारों के रूसी तेल से दूरी बनाने के बाद, रूस ने दूसरे बाजारों को आकर्षित करने के लिए भारी छूट दी।


भारत का बढ़ता आयात

इसमें भारत एक बड़ा खरीदार बनकर उभरा है। युद्ध से पहले, भारत के कुल कच्चे तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी नगण्य थी, लेकिन बाद में यह बढ़कर 40 से 50 प्रतिशत तक पहुंच गई।