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भारत का कर्ज: आंतरिक स्रोतों पर निर्भरता और जापान से वित्तीय सहायता

भारत की कर्ज नीति पर एक विस्तृत दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हुए, यह लेख बताता है कि कैसे देश अपने कर्ज का 97 प्रतिशत हिस्सा आंतरिक स्रोतों से प्राप्त करता है। इसके अलावा, जापान से मिलने वाली वित्तीय सहायता और वैश्विक संस्थानों के साथ संतुलित उधारी की प्रक्रिया पर भी चर्चा की गई है। जानें कि भारत का कर्ज-से-जीडीपी अनुपात क्या है और यह कैसे देश की आर्थिक स्थिरता को प्रभावित करता है।
 

भारत की कर्ज नीति और आंतरिक उधारी


किसी भी विकसित अर्थव्यवस्था के लिए कर्ज लेना एक सामान्य प्रक्रिया है। सरकारें बुनियादी ढांचे के विकास, सामाजिक योजनाओं और विभिन्न परियोजनाओं के लिए धन जुटाने के लिए उधार लेती हैं। केंद्रीय बजट 2026-27 के अनुसार, भारत का कुल बकाया कर्ज लगभग ₹197.18 लाख करोड़ तक पहुंच सकता है। अच्छी बात यह है कि इस कर्ज का अधिकांश हिस्सा देश के भीतर से ही लिया गया है।


आंतरिक कर्ज का प्रमुख हिस्सा

भारत की उधारी का मुख्य आधार घरेलू स्रोत हैं, जैसे सरकारी बॉंड, बैंक और अन्य वित्तीय संस्थान। कुल कर्ज का लगभग 97 प्रतिशत हिस्सा आंतरिक है, जबकि बाहरी कर्ज केवल 3 प्रतिशत के आसपास है, जो लगभग ₹6.74 लाख करोड़ है। यह संतुलन भारत को उन देशों की तुलना में अधिक सुरक्षित बनाता है, जो विदेशी कर्ज पर अधिक निर्भर हैं।


कर्ज-से-जीडीपी अनुपात

विशेषज्ञों के अनुसार, भारत का कर्ज-से-जीडीपी अनुपात लगभग 55.6 प्रतिशत है, जो एक स्थिर स्थिति मानी जाती है। इसका अर्थ है कि देश की अर्थव्यवस्था अपने कर्ज के स्तर को संभालने में सक्षम है और फिलहाल कोई बड़ा जोखिम नहीं है।


बाहरी कर्ज का संतुलन

भारत बाहरी कर्ज के लिए किसी एक देश पर निर्भर नहीं है, बल्कि विभिन्न अंतरराष्ट्रीय संस्थानों और मित्र देशों से संतुलित तरीके से उधार लेता है। विश्व बैंक भारत को सबसे अधिक कर्ज देने वाला प्रमुख संस्थान है, जिसके पास भारत का बकाया कर्ज लगभग 39.3 अरब डॉलर है, जिसका उपयोग आमतौर पर बड़े विकास कार्यों में किया जाता है।


जापान से कर्ज

यदि देशों की बात करें, तो जापान भारत को सबसे अधिक कर्ज देने वाला देश है। भारत पर जापान का बकाया कर्ज 23 अरब डॉलर से अधिक है। यह सहायता मुख्य रूप से उसकी विकास एजेंसियों के माध्यम से दी जाती है, जो कम ब्याज दर पर वित्त उपलब्ध कराती हैं, जिससे परियोजनाओं की लागत कम रहती है।


अन्य वित्तीय सहयोग

इसके अलावा, एशियाई विकास बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसे संस्थान भी भारत को वित्तीय सहयोग प्रदान करते हैं। वहीं, अनिवासी भारतीयों द्वारा भारतीय बैंकों में जमा धन भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, जिसे बाहरी देनदारियों का हिस्सा माना जाता है।


भारत की कर्ज नीति

कुल मिलाकर, भारत की कर्ज नीति संतुलित और सावधानीपूर्वक मानी जाती है। देश बाहरी उधारी को सीमित रखते हुए घरेलू संसाधनों पर अधिक भरोसा करता है, जिससे वैश्विक आर्थिक उतार-चढ़ाव और मुद्रा विनिमय दर में बदलाव का असर कम से कम पड़े और अर्थव्यवस्था स्थिर बनी रहे।