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भारत का पहला बजट: आजादी के बाद की आर्थिक चुनौतियाँ और ऐतिहासिक पहलू

भारत का पहला बजट 26 नवंबर 1947 को पेश किया गया था, जो आजादी के बाद की आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहा था। इस लेख में हम जानेंगे कि कैसे उस समय की परिस्थितियों ने बजट को प्रभावित किया और इसके पीछे की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि क्या थी। क्या आप जानते हैं कि उस समय का बजट घाटे में था? इस लेख में और भी रोचक तथ्य जानें।
 

भारत का आम बजट 2026: एक नई शुरुआत


भारत का आम बजट 1 फरवरी 2026 को संसद में प्रस्तुत किया जाएगा, और इस बार भी वित्त मंत्री के बजट पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं। यह बजट न केवल आम नागरिकों बल्कि बड़े उद्योगपतियों के लिए भी महत्वपूर्ण है। क्या इसमें टैक्स में राहत मिलेगी या महंगाई का बोझ बढ़ेगा, इन सवालों के बीच बजट पर चर्चा तेज हो गई है।


भारत में बजट की परंपरा की शुरुआत

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 112 के अनुसार, बजट को वार्षिक वित्तीय विवरण कहा जाता है, जिसमें सरकार की आय और व्यय का पूरा विवरण होता है। हालांकि, भारत में बजट पेश करने की परंपरा आजादी से पहले ही शुरू हो चुकी थी। पहला बजट 7 अप्रैल 1860 को ब्रिटिश शासन के दौरान पेश किया गया था, जिसे जेम्स विल्सन ने संसद में प्रस्तुत किया था।


आजादी के बाद का पहला बजट

भारत को स्वतंत्रता मिलने के बाद, 15 अगस्त 1947 के तीन महीने बाद, 26 नवंबर 1947 को पहला यूनियन बजट पेश किया गया। यह ऐतिहासिक जिम्मेदारी तत्कालीन वित्त मंत्री सर आर.के. शनमुखम चेट्टी ने निभाई थी। यह बजट 15 अगस्त 1947 से 31 मार्च 1948 तक की अवधि के लिए था।


बंटवारे के समय की चुनौतियाँ

देश उस समय विभाजन, दंगों और विस्थापन की त्रासदी से गुजर रहा था। ऐसे कठिन समय में अर्थव्यवस्था को संभालना एक बड़ी चुनौती थी। सर आर.के. शनमुखम चेट्टी को शरणार्थियों के पुनर्वास और सीमाओं की सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों का सामना करना पड़ा।


एक दिलचस्प तथ्य यह है कि पाकिस्तान के अलग होने के बावजूद, सितंबर 1948 तक भारत और पाकिस्तान एक ही मुद्रा का उपयोग कर रहे थे। सर चेट्टी के इस्तीफे के बाद, जॉन मथाई ने वित्त मंत्री का पद संभाला और 1949-50 का बजट पेश किया, जो संयुक्त भारत का पहला पूर्ण बजट था।


पहले बजट की आर्थिक स्थिति

आज के संदर्भ में उस समय के बजट की राशि चौंकाने वाली है। आजाद भारत के पहले बजट में कुल राजस्व का अनुमान केवल 171.15 करोड़ रुपये था, जबकि सरकार का कुल खर्च लगभग 197.29 करोड़ रुपये था।


इस प्रकार, यह बजट घाटे का रहा, जिसमें राजकोषीय घाटा लगभग 24.59 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। स्वतंत्रता के तुरंत बाद सुरक्षा सबसे बड़ा मुद्दा था, जिसके कारण रक्षा क्षेत्र पर बड़ा खर्च किया गया। बजट में सेना और रक्षा के लिए 92.74 करोड़ रुपये का प्रावधान था, जो कुल खर्च का लगभग आधा हिस्सा था।