भारत की अर्थव्यवस्था: क्या सच में विकास हो रहा है?
भारत की आर्थिक स्थिति पर सवाल
इस सप्ताह रिजर्व बैंक द्वारा ब्याज दरों के निर्णय, शेयर बाजार की स्थिति, जीडीपी के आंकड़े, गिरते रुपये और भारत से भागती पूंजी जैसे मुद्दों ने एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा किया है: आखिरकार, देश की अर्थव्यवस्था कैसे चल रही है? क्या यह एक मजबूत प्लेटफॉर्म पर खड़ी है या एक ऐसे इंजन से बंधी है जो भाप छोड़ रहा है लेकिन ईंधन और ऊर्जा के बिना है?
हर भारतीय को इस पर विचार करना चाहिए कि वर्तमान में भारत की अर्थव्यवस्था का असली इंजन क्या है।
पहले, किसी देश की ताकत उसकी सेना, उद्योग और कृषि से मापी जाती थी, लेकिन अब यह पूंजी, आय, बचत और धन की गति पर निर्भर करती है। इस संदर्भ में, भारत की वास्तविकता क्या है? क्या यह सच नहीं है कि देश के धनी लोग और बुद्धिजीवी विदेशों में बसने का विकल्प चुन रहे हैं? क्या यह चिंता का विषय नहीं है कि विदेशी संस्थागत निवेशक भारतीय शेयर बाजार से पूंजी निकालकर अन्य देशों में निवेश कर रहे हैं? इसका मतलब है कि भारत का शेयर बाजार जोखिम भरा और कम लाभकारी हो गया है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल से जून 2026 के बीच भारत की वास्तविक जीडीपी वृद्धि 7.8 प्रतिशत रही, जबकि सकल मूल्य वर्धन (GVA) में 8.2 प्रतिशत की वृद्धि हुई। फिर भी, यदि भारत की वास्तविक अर्थव्यवस्था इतनी तेजी से बढ़ रही है, तो रुपये और शेयर बाजार की कमजोरी का क्या कारण है? हाल ही में सेंसेक्स में भारी गिरावट आई है। तथ्य यह है कि विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने इस वर्ष लगभग 30.4 अरब डॉलर के भारतीय शेयर बेचे हैं।
यह स्थिति किसी भी मानक पर मामूली नहीं है। एक ओर, सरकारी आंकड़े उत्पादन में वृद्धि दिखाते हैं, दूसरी ओर विदेशी निवेशक भारतीय कंपनियों के भविष्य को लेकर चिंतित हैं और उनके शेयर बेच रहे हैं। इस वर्ष डॉलर के मुकाबले रुपये का मूल्य 7 प्रतिशत से अधिक गिर चुका है।
सरकार का दावा है कि अर्थव्यवस्था तेज विकास, डिजिटल परिवर्तन, और रिकॉर्ड जीएसटी संग्रह के साथ आगे बढ़ रही है, लेकिन वास्तविकता यह है कि बाजार की स्थिति, रुपये की गिरावट, और विदेशी पूंजी का पलायन चिंता का विषय है।
किसानों की स्थिति भी चिंताजनक है। यदि कृषि क्षेत्र में सुधार होता, तो किसान इतनी कठिनाइयों का सामना क्यों कर रहे होते? महंगाई के कारण रिजर्व बैंक को ब्याज दरें बढ़ाने का निर्णय लेना पड़ा। आईटी कंपनियों की स्थिति भी खराब है, और मेक इन इंडिया का सपना भी धूमिल होता दिख रहा है।
इसलिए, चाहे वह घरेलू पूंजी हो या विदेशी, यह स्पष्ट है कि यह भारत की अर्थव्यवस्था को गति नहीं दे रही है। अंततः, 140 करोड़ लोगों की भूख और संघर्ष ही इस अर्थव्यवस्था का असली इंजन है।