भारत की ऊर्जा सुरक्षा में पश्चिम एशिया की भूमिका का बढ़ता महत्व
भारत की ऊर्जा सुरक्षा में बदलाव
सितंबर में भारत की ऊर्जा सुरक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण परिवर्तन देखने को मिला है। रूस से कच्चे तेल का आयात लगातार दूसरे महीने घटा है, जबकि इराक, सऊदी अरब, कुवैत और कतर जैसे पश्चिम एशियाई देशों से खरीद में तेजी आई है। यह बदलाव केवल व्यापारिक आंकड़ों का परिणाम नहीं है, बल्कि इसके पीछे कई कारण हैं, जैसे कि रूस पर पश्चिमी प्रतिबंधों का प्रभाव, चीन की बढ़ती मांग, और यूक्रेन पर हमलों के कारण रूस के तेल और गैस ढांचे पर दबाव।
रूसी तेल का आयात घटा
आंकड़ों के अनुसार, सितंबर में भारत का रूसी कच्चे तेल का आयात अगस्त में 21 लाख बैरल प्रतिदिन से घटकर लगभग 19 लाख बैरल प्रतिदिन रह गया। जुलाई में यह आंकड़ा 28 लाख बैरल प्रतिदिन के उच्चतम स्तर पर था। हालांकि, रूस अब भी भारत का सबसे बड़ा कच्चा तेल आपूर्तिकर्ता बना हुआ है। हालिया रिपोर्टों से संकेत मिलता है कि अक्टूबर और नवंबर में चीन की बढ़ती खरीद और रूस के निर्यात ढांचे पर हमलों का दबाव बना रह सकता है।
पश्चिम एशिया से बढ़ी खरीद
भारत ने इस कमी को भरने के लिए पश्चिम एशिया से तेल की खरीद में तेजी लाई है। इराक से आयात में 238.2 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जो 5.51 लाख बैरल प्रतिदिन तक पहुंच गया। सऊदी अरब से आयात में 56.2 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जो 5.43 लाख बैरल प्रतिदिन हो गया। कुवैत से आयात में 104.4 प्रतिशत की वृद्धि हुई, और कतर से भी आपूर्ति बढ़कर 10 हजार बैरल प्रतिदिन तक पहुंच गई।
सामरिक जोखिम और आपूर्ति की रणनीति
भारत की बढ़ी हुई खरीद ऐसे समय में हुई है जब होर्मुज जलडमरूमध्य में सामरिक दबाव बढ़ रहा है। कई खाड़ी देशों ने सीधे बंदरगाह तक तेल पहुंचाने के बजाय जहाज-से-जहाज तेल हस्तांतरण का सहारा लिया है। इस व्यवस्था में जोखिम का बड़ा हिस्सा आपूर्तिकर्ता पर चला जाता है।
भारत की रणनीतिक चुनौतियाँ
भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती केवल समुद्री सुरक्षा नहीं है, बल्कि अमेरिका द्वारा रूस और ईरान पर लगाए गए प्रतिबंध भी हैं। प्रस्तावित कानून में रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर भारी शुल्क लगाने का प्रावधान है। भारत और चीन इस दबाव के केंद्र में हैं।
ऊर्जा सुरक्षा की नई रणनीति
इस पूरे घटनाक्रम का मुख्य संदेश यह है कि भारत अब तेल को केवल कीमत के आधार पर नहीं देख सकता। तेल की सुरक्षित आपूर्ति अधिक महत्वपूर्ण है। सितंबर में पश्चिम एशियाई देशों की भारत के तेल आयात में हिस्सेदारी 36.7 प्रतिशत रही, जो अगस्त के 26 प्रतिशत से अधिक है।
भविष्य की चुनौतियाँ
आने वाले समय में भारत को एक बहु-स्रोत व्यवस्था बनानी होगी, जिससे किसी एक युद्ध, प्रतिबंध या समुद्री नाकेबंदी से उसकी ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित न हो। यह इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा सामरिक सबक है।