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भारत की एआई प्रतिस्पर्धा: वैश्विक दौड़ में बने रहने की आवश्यकता

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की वैश्विक प्रतिस्पर्धा में भारत की स्थिति चिंताजनक है। बर्नस्टीन की रिपोर्ट के अनुसार, यदि भारत ने अपने फाउंडेशनल एआई मॉडल का विकास नहीं किया, तो वह अमेरिका और चीन जैसे देशों से पीछे रह सकता है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि भारत को तकनीकी आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के लिए अपने स्वदेशी एआई मॉडल विकसित करने की आवश्यकता है। जानें कि कैसे भारत को अपनी एआई रणनीति में बदलाव करने की जरूरत है और क्यों यह भविष्य की तकनीकी प्रतिस्पर्धा के लिए महत्वपूर्ण है।
 

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की वैश्विक दौड़


आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) की वैश्विक प्रतिस्पर्धा अब केवल तकनीकी क्षेत्र तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह एक रणनीतिक और भू-राजनीतिक मुद्दा बन गया है। बर्नस्टीन नामक एक ब्रोकरेज फर्म की हालिया रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि यदि भारत ने अपने फाउंडेशनल एआई मॉडल का विकास नहीं किया, तो वह अमेरिका और चीन जैसे देशों से स्थायी रूप से पीछे रह सकता है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि केवल विदेशी एआई मॉडल पर निर्भर रहकर एप्लिकेशन विकसित करने की रणनीति देश के लिए दीर्घकालिक जोखिम उत्पन्न कर सकती है।


एआई में बढ़ती प्रतिस्पर्धा

बर्नस्टीन का मानना है कि उन्नत एआई मॉडल अब सामान्य सॉफ्टवेयर उत्पादों के रूप में नहीं देखे जा सकते। हाल के वर्षों में अमेरिका द्वारा सेमीकंडक्टर उपकरणों, जीपीयू और एआई तकनीकों पर लगाए गए निर्यात प्रतिबंधों ने यह स्पष्ट किया है कि सरकारें इन्हें रणनीतिक संपत्ति मानती हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि भविष्य में एआई मॉडल की अहमियत रक्षा उपकरणों या उन्नत सैन्य तकनीक के समान हो सकती है। यदि भारत विदेशी मॉडलों पर निर्भर रहता है, तो नई पाबंदियां उसके तकनीकी विकास को बाधित कर सकती हैं और उसे वैश्विक प्रतिस्पर्धा में कमजोर बना सकती हैं।


भारत की पिछड़ने की वजहें

रिपोर्ट के अनुसार, भारत अब तक अपना 'डीपसीक मोमेंट' हासिल नहीं कर पाया है, जिसका मुख्य कारण देश का तकनीकी ढांचा है, जो लंबे समय से आईटी सेवाओं पर निर्भर रहा है। भारतीय कंपनियां वैश्विक सॉफ्टवेयर को अनुकूलित करने में सफल रही हैं, लेकिन बड़े पैमाने पर ऐसे उपभोक्ता प्लेटफार्मों का विकास नहीं कर पाईं जो विशाल डेटा सेट तैयार कर सकें। यह डेटा अत्याधुनिक एआई मॉडल के प्रशिक्षण के लिए आवश्यक है। बर्नस्टीन का कहना है कि इसी कारण से भारत में फाउंडेशनल एआई मॉडल विकसित करने में अपेक्षित प्रगति नहीं हो पाई है।


एआई संप्रभुता की आवश्यकता

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भविष्य में एआई किसी भी देश की डिजिटल संप्रभुता का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है। यदि भारत स्वास्थ्य, रक्षा, वित्तीय सेवाओं और औद्योगिक क्षेत्रों में विदेशी एआई मॉडल पर निर्भर रहता है, तो उसे तकनीकी निर्णयों के लिए बाहरी देशों पर निर्भर रहना पड़ सकता है। बर्नस्टीन ने सुझाव दिया है कि भारत को अपने स्वदेशी फाउंडेशनल मॉडल विकसित करने के साथ-साथ स्वास्थ्य, रक्षा और उद्योग के लिए विशेष एआई मॉडल भी तैयार करने चाहिए। इससे देश को तकनीकी आत्मनिर्भरता प्राप्त करने में मदद मिलेगी और संवेदनशील क्षेत्रों में नियंत्रण बना रहेगा।


नीति में बदलाव की आवश्यकता

बर्नस्टीन ने भारत की मौजूदा एआई रणनीति पर भी सवाल उठाए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, यदि सीमित संसाधनों को कई क्षेत्रों में बांटा जाता रहा, तो किसी एक क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व प्राप्त करना कठिन हो सकता है। फर्म का सुझाव है कि सरकार को घरेलू एआई मॉडल विकसित करने वाली कंपनियों को प्रोत्साहित करना चाहिए या फिर वैश्विक एआई कंपनियों को भारत में ऐसे एआई ढांचे स्थापित करने के लिए प्रेरित करना चाहिए जो भू-राजनीतिक प्रतिबंधों से प्रभावित न हों। रिपोर्ट का निष्कर्ष स्पष्ट है कि भारत के लिए अपना फाउंडेशनल एआई मॉडल विकसित करना अब एक विकल्प नहीं, बल्कि भविष्य की तकनीकी प्रतिस्पर्धा में बने रहने की एक रणनीतिक आवश्यकता बन चुका है।