भारत की कंपनियों पर मिडिल ईस्ट के भू-राजनीतिक तनाव का प्रभाव
मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव का आकलन
भारत की कई प्रमुख लिस्टेड कंपनियां मिडिल ईस्ट में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के चलते अपने क्षेत्रीय जोखिम का मूल्यांकन कर रही हैं। अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर हमलों के बाद स्थिति काफी संवेदनशील हो गई है। हाल की जानकारी के अनुसार, 30 से अधिक कंपनियां, जिनमें इंफ्रास्ट्रक्चर, एविएशन, ऊर्जा, उपभोक्ता वस्तुएं, लॉजिस्टिक्स और फार्मा शामिल हैं, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जोखिम में आ सकती हैं.
तेल आपूर्ति पर असर
इस समय सबसे अधिक ध्यान होर्मुज जलडमरूमध्य पर है, जहां से लगभग 20% कच्चे तेल की आपूर्ति होती है। भारत अपने कुल कच्चे तेल के आयात का 40% से अधिक इसी मार्ग से प्राप्त करता है। ब्रेंट क्रूड की कीमतें 80 डॉलर प्रति बैरल के पार जा चुकी हैं, और यदि आपूर्ति में बाधा आती है, तो कीमतें 90 से 100 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं। हर एक डॉलर की वृद्धि से भारत के आयात बिल पर लगभग 2 अरब डॉलर का अतिरिक्त बोझ पड़ता है.
मिडिल ईस्ट का आर्थिक महत्व
मिडिल ईस्ट भारत के कुल माल निर्यात का लगभग 17% हिस्सा और कच्चे तेल की 55% आपूर्ति करता है। इसके अलावा, भारत को मिलने वाले रेमिटेंस का एक बड़ा हिस्सा भी इसी क्षेत्र से आता है। यदि संघर्ष लंबा खिंचता है, तो इसका प्रभाव चालू खाते के घाटे और महंगाई पर पड़ सकता है.
तेल विपणन कंपनियों पर प्रभाव
तेल विपणन कंपनियां जैसे हिंदुस्तान पेट्रोलियम, इंडियन ऑयल और भारत पेट्रोलियम पहले ही इस स्थिति से प्रभावित हो रही हैं। ब्रेंट में हर एक डॉलर की वृद्धि से इनके ईबीआईटीडीए में 7-9% तक गिरावट आ सकती है, यदि खुदरा कीमतों में कोई बदलाव नहीं किया जाता.
इंफ्रास्ट्रक्चर और एविएशन सेक्टर पर दबाव
इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र में लार्सन और टुब्रो का मिडिल ईस्ट में सबसे अधिक एक्सपोजर है। इसके अलावा, केईसी इंटरनेशनल और कल्पतरु प्रोजेक्ट्स की परियोजनाएं भी क्षेत्रीय स्थिरता पर निर्भर हैं। समुद्री मार्गों में रुकावट से प्रोजेक्ट निष्पादन और लागत दोनों प्रभावित हो सकते हैं. एविएशन सेक्टर, विशेषकर इंडिगो, भी दबाव में है, क्योंकि इसकी अंतरराष्ट्रीय क्षमता का एक बड़ा हिस्सा मिडिल ईस्ट से जुड़ा है.
गैस वितरण और उपभोक्ता सेक्टर पर प्रभाव
गैस वितरण कंपनियां जैसे इंद्रप्रस्थ गैस और गुजरात गैस भी एलएनजी कीमतों में वृद्धि से प्रभावित हो सकती हैं। उपभोक्ता और फार्मा सेक्टर की कई कंपनियों का 5-10% राजस्व मिडिल ईस्ट से आता है, और ऑटो तथा टायर कंपनियों पर कच्चे तेल से जुड़े इनपुट कॉस्ट का दबाव बढ़ सकता है.
डिफेंस सेक्टर के लिए अवसर
हालांकि, इस पूरे परिदृश्य में डिफेंस सेक्टर संभावित लाभार्थी के रूप में उभर रहा है। रक्षा बजट में लगातार बढ़ोतरी और भू-राजनीतिक अस्थिरता के कारण भारत इलेक्ट्रॉनिक्स, हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स और डेटा पैटर्न्स जैसी कंपनियों के लिए अवसर बढ़ सकते हैं.
भविष्य की अनिश्चितता
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि होर्मुज जलडमरूमध्य कितने समय तक सुरक्षित और खुला रहेगा। यदि आपूर्ति लंबे समय तक बाधित होती है, तो यह केवल शेयर बाजार की अस्थायी गिरावट नहीं, बल्कि व्यापक आर्थिक दबाव का संकेत हो सकता है, और कॉरपोरेट इंडिया के लिए यह एक गंभीर परीक्षा साबित हो सकता है.