भारत को वैश्विक निवेश प्रबंधन का केंद्र बनाने की दिशा में सरकार के नए कदम
केंद्र सरकार ने भारत को वैश्विक निवेश प्रबंधन का केंद्र बनाने के लिए नए नियमों की घोषणा की है। इस कदम से विदेशी निवेश फंड के लिए संचालन में आसानी होगी, जिससे देश में विदेशी पूंजी को आकर्षित करने में मदद मिलेगी। नए विधेयक में कई शर्तों को हटाने का प्रस्ताव है, जिससे निवेश गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण जल्द ही इसे लोकसभा में पेश कर सकती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ये बदलाव भारत को निवेश के लिए एक प्रतिस्पर्धी गंतव्य बनाने में सहायक होंगे।
Aug 3, 2026, 20:21 IST
भारत में विदेशी निवेश को बढ़ावा देने के लिए नए नियम
केंद्र सरकार ने भारत को वैश्विक निवेश प्रबंधन का एक प्रमुख केंद्र बनाने के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाया है। नए प्रस्ताव के तहत, एलिजिबल निवेश फंड से संबंधित नियमों को सरल बनाया जाएगा, जिससे विदेशी निवेश फंड के लिए भारत में संचालन करना पहले से अधिक सुगम हो जाएगा। यह कदम देश में विदेशी पूंजी को आकर्षित करने और निवेश गतिविधियों को प्रोत्साहित करने में सहायक माना जा रहा है।
हालिया जानकारी के अनुसार, कराधान और अन्य कानून (संशोधन) विधेयक, 2026 में कई ऐसे प्रावधान शामिल किए गए हैं, जिनके माध्यम से भारत में संचालित विदेशी निवेश फंड को वैश्विक आय पर कर छूट प्राप्त करने के लिए पहले की कई शर्तों से राहत दी जाएगी। अब इन फंडों के लिए 25 निवेशकों की अनिवार्यता, किसी एक निवेशक की हिस्सेदारी 10 प्रतिशत तक सीमित रखने की शर्त, एक ही संस्था में कुल निवेश का 25 प्रतिशत से अधिक निवेश न करने की बाध्यता, संबद्ध संस्थाओं में निवेश से जुड़े प्रतिबंध और 100 करोड़ रुपये की न्यूनतम औसत मासिक फंड राशि जैसी शर्तों को हटाने का प्रस्ताव है।
यह विधेयक पहले ही संसद सदस्यों के बीच वितरित किया जा चुका है और केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण इसे जल्द ही लोकसभा में पेश कर सकती हैं। इसके साथ ही, अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्र में संचालित निवेश फंड के लिए अलग से लागू छूट संबंधी नियमों को समाप्त करने का भी प्रस्ताव है। सरकार का उद्देश्य सभी विदेशी निवेश फंड के लिए एक समान व्यवस्था लागू करना है।
नांगिया ग्लोबल के विलय एवं अधिग्रहण मामलों के भागीदार अभीत सचदेवा का कहना है कि ये बदलाव भारत के निवेश प्रबंधन तंत्र को और अधिक आकर्षक बनाएंगे, जिससे विदेशों में संचालित कई निवेश प्रबंधन गतिविधियां भारत की ओर स्थानांतरित हो सकती हैं।
जून में, सरकार ने एक अध्यादेश के माध्यम से विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों को सरकारी प्रतिभूतियों से मिलने वाली ब्याज आय और पूंजीगत लाभ पर कर छूट दी थी। अब इस व्यवस्था को विधेयक के माध्यम से कानूनी रूप देने का प्रस्ताव है। सरकार का मानना है कि पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता के बीच विदेशी पूंजी को आकर्षित करना आवश्यक है।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण पहले भी कह चुकी हैं कि विदेशी निवेश को बढ़ाना सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल है और इसके लिए आगे भी नए कदम उठाए जा सकते हैं। इसी दिशा में, भारतीय रिजर्व बैंक ने विदेशी मुद्रा गैर निवासी जमा से जुड़ी अदला-बदली सुविधा को सितंबर तक जारी रखने का निर्णय लिया है। इसके अलावा, सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को विदेशी वाणिज्यिक ऋण जुटाने के लिए विशेष सुविधा भी प्रदान की गई है।
ग्रांट थॉर्नटन भारत की कर विशेषज्ञ ऋचा साहनी का कहना है कि यह विधेयक केवल तात्कालिक राहत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत को लंबे समय तक निवेश के लिए एक प्रतिस्पर्धी और भरोसेमंद गंतव्य बनाने की रणनीति का हिस्सा है। उल्लेखनीय है कि जुलाई के अंत तक इन उपायों के बाद देश में 40.81 अरब डॉलर का शुद्ध विदेशी निवेश आया, जबकि विदेशी मुद्रा भंडार भी बढ़कर 682.354 अरब डॉलर पर पहुंच गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ये प्रस्ताव लागू होते हैं, तो भारत वैश्विक निवेश प्रबंधन क्षेत्र में अपनी स्थिति को और मजबूत कर सकता है।