भारत-चीन की ऐतिहासिक बैठक: क्या बदलेंगे वैश्विक आर्थिक समीकरण?
नई दिल्ली में वैश्विक कूटनीति का नया अध्याय
नई दिल्ली: भारत मंडपम के भव्य प्रांगण में आज वैश्विक कूटनीति का एक नया और महत्वपूर्ण अध्याय लिखा जा रहा है। ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच होने वाली द्विपक्षीय वार्ता पर पूरी दुनिया की नजरें हैं। गलवान घाटी में संघर्ष के बाद उत्पन्न तनाव को पीछे छोड़ते हुए, यह बैठक दोनों देशों के आर्थिक और व्यापारिक संबंधों को नई दिशा दे सकती है। अमेरिका सहित अन्य शक्तियाँ इस मुलाकात के हर पहलू का बारीकी से अध्ययन कर रही हैं, क्योंकि यह केवल दो पड़ोसी देशों की सामान्य बैठक नहीं है, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था और भू-राजनीतिक संतुलन पर प्रभाव डालने वाली एक महत्वपूर्ण घटना है।
रेयर अर्थ और सप्लाई चेन का भविष्य
चीन से प्राप्त होने वाले रेयर अर्थ मिनरल्स भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स, इलेक्ट्रिक वाहनों, रक्षा, सेमीकंडक्टर और उच्च तकनीकी निर्माण क्षेत्र के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। चीन के पास दुनिया के लगभग 90% रेयर अर्थ प्रोसेसिंग का नियंत्रण है, जिससे पहले की पाबंदियों ने भारतीय उद्योग को प्रभावित किया था। भारत मंडपम में बातचीत के दौरान, भारत इन महत्वपूर्ण खनिजों के साथ-साथ विशेष उर्वरकों और सौर घटकों की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करने पर जोर देगा, ताकि घरेलू आपूर्ति श्रृंखला और किसानों के हित सुरक्षित रह सकें।
मोदी-जिनपिंग की ऐतिहासिक वार्ता
इस बहुप्रतीक्षित बैठक का सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा भारत और चीन के बीच बढ़ता व्यापार घाटा है। दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार लगभग 155.6 अरब डॉलर तक पहुँच चुका है, जिसमें भारत का व्यापार घाटा लगभग 115 अरब डॉलर है। भारत बड़े पैमाने पर चीन से इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, सौर उपकरण, रसायन और सक्रिय फार्मास्युटिकल सामग्री का आयात करता है, जबकि भारतीय उत्पादों को चीनी बाजारों में उचित पहुँच नहीं मिल पाती। इस बैठक में प्रधानमंत्री मोदी इस मुद्दे को जोरदार तरीके से उठाएंगे कि चीन भारतीय आईटी, फार्मास्युटिकल और कृषि उत्पादों के लिए अपने दरवाजे खोले, ताकि दोनों देशों के बीच व्यापार का संतुलन स्थापित हो सके।
भारत-चीन का साथ: वैश्विक आर्थिक समीकरण में बदलाव
वर्तमान में जब वैश्विक स्तर पर आर्थिक अस्थिरता और टैरिफ युद्ध का खतरा बढ़ रहा है, तब भारत और चीन जैसे दो बड़े एशियाई देशों का एक साथ आना एक मजबूत आर्थिक संदेश देता है। 11 देशों वाले विस्तारित ब्रिक्स समूह के दायरे में यह बैठक डॉलर पर निर्भरता कम करने, आपसी मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने और एक मजबूत आपूर्ति तंत्र स्थापित करने की दिशा में मील का पत्थर साबित हो सकती है। दोनों देश तकनीक, इलेक्ट्रिक वाहनों और नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में एक-दूसरे के पूरक बनकर वैश्विक बाजार को नई दिशा देने की क्षमता रखते हैं, बशर्ते आपसी विश्वास की नींव मजबूत हो।