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भारत ने अमेरिकी ट्रेजरी में निवेश में की कमी, नई रणनीति की ओर बढ़ा

भारत ने अमेरिकी ट्रेजरी में अपने निवेश में कमी की है, जो वैश्विक आर्थिक और भू-राजनीतिक अस्थिरताओं के बीच एक महत्वपूर्ण बदलाव को दर्शाता है। पिछले एक वर्ष में, भारत ने अमेरिकी ट्रेजरी नोट्स में अपनी हिस्सेदारी में लगभग 21 प्रतिशत की कमी की है। यह गिरावट उस समय आई है जब अमेरिकी बॉंड बाजार में रिटर्न आकर्षक था। विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव भारत की विदेशी मुद्रा भंडार नीति में बदलाव का संकेत है, जिसमें अब विविधता पर अधिक ध्यान दिया जा रहा है।
 

भारत की अर्थव्यवस्था में बदलाव

नई दिल्ली - भारत और अमेरिका के बीच चल रहे टैरिफ विवाद के बीच, भारत अपनी अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए विभिन्न रणनीतिक कदम उठा रहा है। इस दिशा में, पिछले एक वर्ष में भारत ने अमेरिकी ट्रेजरी बॉंड में अपने निवेश में महत्वपूर्ण कमी की है। यह बदलाव दर्शाता है कि वैश्विक आर्थिक और भू-राजनीतिक अस्थिरताओं के बीच, भारत अपनी विदेशी मुद्रा भंडार नीति में धीरे-धीरे बदलाव कर रहा है और अब निवेश को अधिक विविधता देने पर ध्यान केंद्रित कर रहा है।


अमेरिकी ट्रेजरी में भारत की हिस्सेदारी में कमी
ब्लूमबर्ग के आंकड़ों के अनुसार, 31 अक्टूबर 2024 से 31 अक्टूबर 2025 के बीच भारत की अमेरिकी ट्रेजरी नोट्स में हिस्सेदारी लगभग 21 प्रतिशत घट गई है। इस अवधि में निवेश 241.4 अरब डॉलर से घटकर 190.7 अरब डॉलर पर आ गया। यह पिछले चार वर्षों में पहली बार है जब भारत का अमेरिकी ट्रेजरी में निवेश सालाना आधार पर घटा है। इससे पहले, यह निवेश या तो बढ़ रहा था या स्थिर बना हुआ था।


ब्लूमबर्ग के आंकड़ों के अनुसार, 31 अक्टूबर 2024 से 31 अक्टूबर 2025 के बीच भारत की अमेरिकी ट्रेजरी नोट्स में हिस्सेदारी करीब 21 प्रतिशत कम हो गई। यह निवेश 241.4 अरब डॉलर से घटकर 190.7 अरब डॉलर पर आ गया। पिछले चार वर्षों में यह पहली बार है जब भारत के अमेरिकी ट्रेजरी निवेश में सालाना गिरावट दर्ज की गई है। इससे पहले के वर्षों में यह निवेश या तो बढ़ रहा था या लगभग स्थिर बना हुआ था।


यह गिरावट उस समय आई है जब अमेरिकी बॉंड बाजार में रिटर्न (यील्ड) काफी आकर्षक था। इस दौरान 10 साल की अमेरिकी ट्रेजरी पर यील्ड लगभग 4.0 से 4.8 प्रतिशत के बीच रही, जो आमतौर पर विदेशी निवेशकों को आकर्षित करती है। इसके बावजूद, भारत ने अपनी होल्डिंग कम की। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि इसका कारण केवल यील्ड नहीं है, बल्कि भारत की विदेशी मुद्रा भंडार को लेकर बदली हुई रणनीति भी है। इसका मतलब है कि भारत अब अपने रिजर्व को विभिन्न स्थानों पर बांटने (डाइवर्सिफिकेशन) पर अधिक ध्यान दे रहा है।