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भारत में असुरक्षित ऋणों की वृद्धि: एक नई रिपोर्ट का खुलासा

हाल ही में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया द्वारा जारी एक रिपोर्ट में भारत में असुरक्षित ऋणों की वृद्धि का खुलासा हुआ है। पिछले 20 वर्षों में बिना गारंटी वाले ऋणों का आकार कई गुना बढ़ गया है, जिससे बैंकिंग प्रणाली में जोखिम बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि युवा वर्ग में ऋण लेने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। जानें इस रिपोर्ट में और क्या महत्वपूर्ण जानकारी दी गई है।
 

एसबीआई की नई रिपोर्ट में महत्वपूर्ण जानकारी


Business News Today : हाल ही में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया द्वारा जारी एक रिपोर्ट में यह बताया गया है कि पिछले 20 वर्षों में भारतीय उपभोक्ताओं ने असुरक्षित ऋण, यानी बिना किसी गारंटी के ऋण, का अधिकतम उपयोग किया है। इस अवधि में इन ऋणों का आकार कई गुना बढ़ गया है।


रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2005 में असुरक्षित ऋणों का कुल आकार केवल 2 लाख करोड़ रुपये था, जो वित्त वर्ष 2025 में बढ़कर 46.9 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। इस प्रकार, कुल बैंक ऋण में असुरक्षित ऋणों की हिस्सेदारी में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। बिना किसी गिरवी के दिए जाने वाले इन ऋणों की बढ़ती संख्या ने बैंकिंग प्रणाली में जोखिम को लेकर नई चर्चाएं शुरू कर दी हैं।


बैंकों का क्रेडिट जोखिम बढ़ता जा रहा है

वित्त वर्ष 2005 में असुरक्षित ऋणों की हिस्सेदारी 17.7 प्रतिशत थी, जो अब वित्त वर्ष 2025 में बढ़कर 24.5 प्रतिशत हो गई है। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि वित्त वर्ष 2019 के बाद से कुल ऋण में असुरक्षित ऋणों की हिस्सेदारी लगातार 20 प्रतिशत से अधिक बनी हुई है। चूंकि ये ऋण बिना किसी कोलेटरल के दिए जाते हैं, इसलिए इनकी बढ़ती संख्या बैंकिंग प्रणाली में संभावित क्रेडिट जोखिम को दर्शाती है।


युवाओं में ऋण लेने की प्रवृत्ति

चिंताजनक बात यह है कि फिनटेक द्वारा दिए गए इन ऋणों में से आधे से अधिक 35 वर्ष से कम आयु के उधारकर्ताओं को दिए गए हैं, जो युवा वर्ग के बीच बढ़ते कर्ज के जोखिम को दर्शाते हैं। हालांकि, यह भी बताया गया है कि बैंकों और एनबीएफसी में असुरक्षित बिजनेस लोन मुख्य रूप से उच्च गुणवत्ता वाले उधारकर्ताओं के पास हैं, जो एसेट क्वालिटी के लिहाज से सकारात्मक है।


असुरक्षित ऋणों में भारी वृद्धि के बावजूद, बैंकिंग क्षेत्र के लिए एक अच्छी खबर यह है कि बैंकों की परिसंपत्ति गुणवत्ता में सुधार हुआ है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, बैंकों का सकल गैर-निष्पादित परिसंपत्ति अनुपात (एनपीए), जो 2018 में 11.46 प्रतिशत के उच्चतम स्तर पर था, 2025 में घटकर 2.31 प्रतिशत रह गया है।