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भारत में ऊर्जा आयात में अमेरिका की बढ़ती भूमिका

भारत के ऊर्जा आयात में हालिया बदलावों ने अमेरिका को एक प्रमुख आपूर्तिकर्ता बना दिया है। मई में अमेरिका ने भारत को द्रवीकृत प्राकृतिक गैस और पेट्रोलियम गैस की आपूर्ति में वृद्धि की, जो खाड़ी देशों से आने वाली आपूर्ति में कमी के कारण हुआ। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में भारत और अमेरिका के बीच ऊर्जा व्यापार का केंद्र गैस क्षेत्र बनेगा। इस बदलाव का भारतीय अर्थव्यवस्था और उपभोक्ताओं पर गहरा प्रभाव पड़ने की संभावना है।
 

भारत के ऊर्जा आयात में बदलाव

दुनिया में ऊर्जा आपूर्ति की अनिश्चितता का प्रभाव अब भारत के आयात पैटर्न पर स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। मई में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन हुआ, जब अमेरिका भारत के लिए द्रवीकृत प्राकृतिक गैस और द्रवीकृत पेट्रोलियम गैस का सबसे बड़ा स्रोत बन गया। यह बदलाव उस समय आया है जब पश्चिम एशिया में तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य में बाधाओं के कारण खाड़ी देशों से ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हुई है.


आपूर्ति के आंकड़े

वर्तमान में, भारत अपनी द्रवीकृत प्राकृतिक गैस की लगभग 60 प्रतिशत और द्रवीकृत पेट्रोलियम गैस की पूरी आपूर्ति होर्मुज जलडमरूमध्य के माध्यम से प्राप्त करता है। यह समुद्री मार्ग वैश्विक ऊर्जा व्यापार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। हालाँकि, अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई के बाद इस मार्ग पर आवाजाही में बाधा आई, जिससे ऊर्जा आपूर्ति की स्थिति में बदलाव आया.


अमेरिका की आपूर्ति में वृद्धि

ऊर्जा बाजार से जुड़े आंकड़ों के अनुसार, मई में अमेरिका ने भारत को लगभग 6.3 लाख टन द्रवीकृत पेट्रोलियम गैस की आपूर्ति की, जो खाड़ी देशों से प्राप्त 3.8 लाख टन की आपूर्ति से लगभग 60 प्रतिशत अधिक है। इसी तरह, द्रवीकृत प्राकृतिक गैस के क्षेत्र में भी अमेरिका ने अपनी हिस्सेदारी तेजी से बढ़ाई.


विशेषज्ञों की राय

विशेषज्ञों का कहना है कि मई में अमेरिका से भारत को लगभग 9 लाख टन द्रवीकृत प्राकृतिक गैस की आपूर्ति हुई, जो भारत की कुल जरूरत का 40 प्रतिशत से अधिक है। यह अप्रैल की तुलना में लगभग तीन गुना वृद्धि है। ऊर्जा विश्लेषक सुमित रितोलिया का मानना है कि आने वाले वर्षों में भारत और अमेरिका के बीच ऊर्जा व्यापार का केंद्र गैस क्षेत्र बनने जा रहा है.


परिवहन लागत और विकल्प

युद्ध और आपूर्ति संकट से पहले, अमेरिकी गैस को भारत में बड़ी हिस्सेदारी हासिल करने में कठिनाई होती थी, मुख्यतः परिवहन लागत के कारण। खाड़ी देशों से आने वाली गैस भारत के लिए अपेक्षाकृत सस्ती थी। लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में भारत के पास विकल्प सीमित हो गए हैं, जिससे अमेरिकी गैस की मांग बढ़ी है.


भविष्य की संभावनाएँ

ऊर्जा क्षेत्र के विशेषज्ञ मनीष सेजवाल का कहना है कि जून के अंत तक अमेरिका से भारत आने वाली द्रवीकृत पेट्रोलियम गैस की मात्रा 10 लाख टन को पार कर सकती है। यह भारत के ऊर्जा आयात ढांचे में एक महत्वपूर्ण बदलाव माना जा रहा है.


राजनीतिक संवेदनशीलता

द्रवीकृत पेट्रोलियम गैस का उपयोग भारत में मुख्य रूप से रसोई गैस के रूप में किया जाता है, और इसकी कीमत और उपलब्धता राजनीतिक रूप से संवेदनशील विषय हैं। इसलिए, सरकारें आम उपभोक्ताओं को वैश्विक कीमतों में उतार-चढ़ाव से बचाने का प्रयास करती रही हैं.


अमेरिका का लाभ

एक वैश्विक वित्तीय संस्था की हालिया रिपोर्ट में अमेरिका को भारत की ऊर्जा खरीद रणनीति में बदलाव का सबसे बड़ा लाभार्थी बताया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, युद्ध से पहले की तुलना में भारत को अमेरिकी गैस निर्यात लगभग आठ गुना बढ़ चुका है.


आर्थिक प्रभाव

विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका चाहता है कि भारत के साथ उसका व्यापार घाटा कम हो, और ऊर्जा आयात इस दिशा में सबसे प्रभावी माध्यम बन सकता है। हालांकि अमेरिकी गैस खाड़ी देशों की तुलना में महंगी है, लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में भारत के पास बहुत अधिक विकल्प नहीं हैं.


भारतीय मुद्रा पर प्रभाव

ईरान से जुड़े संघर्ष के बाद भारत का ऊर्जा आयात बिल बढ़ा है, जिसका असर भारतीय मुद्रा पर भी देखने को मिला है। भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल आयातक, चौथा सबसे बड़ा द्रवीकृत प्राकृतिक गैस आयातक और दूसरा सबसे बड़ा द्रवीकृत पेट्रोलियम गैस आयातक देश है। ऐसे में वैश्विक ऊर्जा बाजार में होने वाले बदलावों का सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था और उपभोक्ताओं पर पड़ना स्वाभाविक है.