×

भारत में जीडीपी मापने की नई प्रणाली का आगाज़

भारत सरकार इस हफ्ते जीडीपी गणना के लिए एक नई और अधिक सटीक प्रणाली पेश करने जा रही है। यह बदलाव अर्थव्यवस्था की वास्तविक तस्वीर को बेहतर ढंग से दर्शाने के लिए किया जा रहा है। नई प्रणाली में कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स और होलसेल प्राइस इंडेक्स के अधिक आइटम शामिल किए जाएंगे, जिससे आंकड़ों की विश्वसनीयता में वृद्धि होगी। जानें इस नई प्रणाली के कार्यप्रणाली और इसके पीछे के कारणों के बारे में।
 

सरकार की नई जीडीपी गणना प्रणाली


सरकार इस हफ्ते जीडीपी की गणना के लिए नई प्रणाली पेश करेगी


बिजनेस डेस्क : किसी भी देश की आर्थिक प्रगति का सही आंकलन करना अत्यंत आवश्यक है। विश्व की प्रमुख आर्थिक शक्तियाँ अपनी जीडीपी वृद्धि को विश्व के समक्ष विश्वसनीय आंकड़ों के माध्यम से प्रस्तुत करती हैं। ये आंकड़े यह दर्शाते हैं कि किस देश ने कितनी आर्थिक प्रगति की है।


इसी संदर्भ में, भारतीय अर्थव्यवस्था की वास्तविक वृद्धि को मापने के तरीके में महत्वपूर्ण बदलाव होने जा रहा है। सरकार इस हफ्ते जीडीपी की गणना के लिए एक नई और अधिक सटीक प्रणाली पेश करने की योजना बना रही है, जिससे आंकड़ों की विश्वसनीयता में वृद्धि होगी।


नई प्रणाली का कार्यप्रणाली

सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के सचिव सौरभ गर्ग ने बताया कि अर्थव्यवस्था की वास्तविक स्थिति को दर्शाने के लिए अब कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (सीपीआई) और पुराने होलसेल प्राइस इंडेक्स (डब्ल्यूपीआई) से लगभग 500-600 वस्तुओं का उपयोग किया जाएगा। पहले, महंगाई के प्रभाव को घटाकर रियल जीडीपी निकालने के लिए केवल 180 वस्तुओं का उपयोग किया जाता था।


नई प्रणाली के बदलाव का कारण

अर्थशास्त्रियों ने लंबे समय से चिंता जताई थी कि जीडीपी मापने का पुराना तरीका अब अप्रचलित हो चुका है, क्योंकि यह मुख्य रूप से थोक महंगाई पर निर्भर था, जबकि आम लोगों से जुड़े कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स को नजरअंदाज किया गया। पिछले साल नवंबर में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने भी भारत की जीडीपी गणना प्रणाली की कमजोरियों पर सवाल उठाए थे। आईएमएफ ने पुराने 2011-12 के बेस ईयर और 'सिंगल डिफ्लेशन' विधि के अधिक उपयोग के कारण इस प्रणाली को 'सी' रेटिंग दी थी।


नई प्रणाली में सुधार

इस बदलाव का सबसे महत्वपूर्ण पहलू 'डबल डिफ्लेशन' तकनीक को अपनाना है। इस तकनीक में इनपुट (लागत) और आउटपुट (तैयार माल) दोनों की कीमतों में होने वाले परिवर्तनों को अलग-अलग समायोजित किया जाता है। सौरभ गर्ग के अनुसार, इससे विशेष रूप से मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र के आंकड़ों की सटीकता में सुधार होगा, जो पुराने तरीके में इनपुट और आउटपुट की कीमतों के अंतर के कारण सही नहीं आ पाते थे।


अधिक जानकारी के लिए

ये भी पढ़ें : सोना हुआ सस्ता, चांदी फिर चमकी