भारत में प्लास्टिक कचरा प्रबंधन नियम 2026: नई चुनौतियाँ और समाधान
प्लास्टिक प्रदूषण के खिलाफ सख्त कदम
भारत में प्लास्टिक प्रदूषण की समस्या को समाप्त करने के लिए, सरकार ने 2016 में ठोस प्लास्टिक कचरा प्रबंधन नियमों की शुरुआत की थी। पिछले एक दशक में, कंपनियों ने इन नियमों को गंभीरता से नहीं लिया, जिससे कचरे की मात्रा बढ़ती गई। इस लापरवाही को देखते हुए, सरकार ने 'प्लास्टिक कचरा प्रबंधन नियम 2026' में महत्वपूर्ण और कड़े बदलाव किए हैं, जो 1 अप्रैल 2026 से लागू होंगे। नए नियमों के तहत, कंपनियों पर न केवल भारी जुर्माना लगाया जाएगा, बल्कि उनके लाइसेंस भी रद्द किए जा सकते हैं। इस कानून की मुख्य विशेषता EPR (Extended Producer Responsibility) है, जिसका अर्थ है कि कंपनियों को अपनी फैलाई गई गंदगी को खुद साफ करना होगा।
पर्यावरण के लिए आवश्यक कदम
ये नियम हमारे पर्यावरण और भविष्य की पीढ़ियों के स्वास्थ्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। भारत में हर साल लाखों टन प्लास्टिक कचरा उत्पन्न होता है, जो कभी खत्म नहीं होता और हमारे आस-पास के जल, वायु और भूमि को प्रदूषित करता है। सरकार का लक्ष्य है कि 2027-28 तक रीसाइक्लिंग का लक्ष्य 60% तक बढ़ाया जाए। जब कंपनियां पुराने प्लास्टिक का पुनः उपयोग करेंगी, तो सड़कों पर कचरे की मात्रा कम होगी और नए प्लास्टिक के लिए कच्चे तेल की आवश्यकता भी घटेगी। इससे 'सर्कुलर इकोनॉमी' को बढ़ावा मिलेगा, जिसका अर्थ है कि फेंकने के बजाय प्लास्टिक को वापस फैक्ट्री में ले जाकर नया सामान बनाया जाएगा।
नए नियमों में क्या बदलाव हैं?
अब प्लास्टिक कचरे का पूरा हिसाब-किताब डिजिटल रूप में रखा जाएगा ताकि पुरानी गलतियों को न दोहराया जा सके। हर प्लास्टिक बोतल या पैकेट पर एक विशेष 'क्यूआर कोड' होगा, जिसे स्कैन करने पर यह पता चलेगा कि यह प्लास्टिक कहाँ बना है और इसे वापस उठाने की जिम्मेदारी किस कंपनी की है। वर्तमान में, सरकार के रिकॉर्ड में 35,000 से अधिक कंपनियों ने अपना नाम दर्ज कराया है। इसके अलावा, फैक्ट्री के कचरे और उपभोक्ताओं द्वारा फेंके गए कचरे के बीच का अंतर स्पष्ट किया गया है, ताकि कंपनियां कागजों में हेराफेरी न कर सकें। अब हर कंपनी को अपने प्लास्टिक के उपयोग की पूरी जानकारी ऑनलाइन पोर्टल पर देनी होगी।
सिस्टम में चुनौतियाँ
इन अच्छे नियमों के बावजूद, सिस्टम में कुछ कमियाँ हैं जो इस प्रक्रिया को कमजोर कर रही हैं। सबसे बड़ी समस्या यह है कि जिन कंपनियों ने पिछले वर्षों में अपना रीसाइक्लिंग लक्ष्य पूरा नहीं किया, उन्हें 'कैरी फॉरवर्ड' की सुविधा दी गई है। इसका मतलब है कि वे अपना अधूरा काम अगले वर्ष पर टाल सकती हैं। बार-बार समय मिलने के कारण कंपनियों में कानून का डर कम हो गया है। साथ ही, पोर्टल पर जो जानकारी कंपनियां स्वयं भरती हैं, उसकी जांच करने के लिए कोई मजबूत व्यवस्था नहीं है।
कंपनियों की लापरवाही
सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड (CPCB) और CSE की रिपोर्टों से स्पष्ट है कि 2016 के नियम प्रभावी नहीं रहे। आंकड़ों के अनुसार, देश में प्लास्टिक कचरा उत्पन्न करने वाली 4,953 बड़ी इकाइयों में से लगभग आधी कंपनियों ने अपना रजिस्ट्रेशन नहीं कराया। हर साल लगभग 34 लाख टन प्लास्टिक कचरा उत्पन्न होता है, लेकिन कंपनियां इसका केवल 9% से 10% ही रीसाइक्लिंग कर पाती हैं। शेष कचरा या तो डंपिंग ग्राउंड में फेंका जाता है या जला दिया जाता है। कंपनियों ने मुनाफा बचाने के लिए कचरा एकत्र करने का कोई सिस्टम नहीं बनाया और सरकार द्वारा बार-बार डेडलाइन बढ़ाने का फायदा उठाया।
निगरानी में कठिनाइयाँ
निगरानी के मामले में भी कई चुनौतियाँ हैं। भारत में लाखों छोटी फैक्ट्रियाँ प्लास्टिक का उत्पादन करती हैं, जहाँ सरकारी अधिकारियों का पहुँचना मुश्किल है। हालांकि, अब बाहरी लोगों से जांच कराने की बात की गई है, लेकिन मिलीभगत के कारण सही रिपोर्ट मिलना कठिन है। बिना लैब में जांच किए यह पता लगाना मुश्किल है कि किसी उत्पाद में वास्तव में पुराना प्लास्टिक मिलाया गया है या नहीं।
नियमों का पालन महंगा
कंपनियों के लिए इन नियमों का पालन करना महंगा साबित हो रहा है। नया प्लास्टिक बनाना सस्ता है, जबकि पुराने कचरे को इकट्ठा करके उसे साफ करना और फिर से नया जैसा बनाना 15% से 20% अधिक खर्चीला है। मुनाफे के चक्कर में कई कंपनियाँ नियमों का उल्लंघन करती हैं। इसके अलावा, हमारे देश में कूड़ा बीनने वाले असल में प्लास्टिक को काम लायक बनाते हैं, लेकिन नए नियमों में उनके लिए कोई सहायता योजना नहीं है। जब तक रीसाइक्लिंग प्लास्टिक सस्ता नहीं होगा, तब तक यह प्रणाली पूरी तरह सफल नहीं हो पाएगी।